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७० वर्षों में बदल गया महाराष्ट्र का मौसम…मराठवाड़ा और तपने लगा, कोंकण में बढ़ी नमी!

-जलवायु अध्ययन में सामने आए क्षेत्रीय बदलाव; खेती, पानी और स्वास्थ्य के सामने नई चुनौतियां

सामना संवाददाता / मुंबई

महाराष्ट्र के मौसम का मिजाज पिछले सात दशकों में बदलने के संकेत मिले हैं। भारतीय मौसम विभाग और पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, मराठवाड़ा और पश्चिम विदर्भ के कुछ हिस्सों में जलवायु अधिक गर्म तथा शुष्क होने की प्रवृत्ति सामने आई है। वहीं कोंकण के तटीय क्षेत्रों में नमी की स्थिति अलग तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह बदलाव केवल तापमान के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसका असर खेती, जल उपलब्धता, पशुपालन और नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
मराठवाड़ा पहले से ही अनियमित वर्षा और जलसंकट जैसी चुनौतियों का सामना करता रहा है। ऐसे में बढ़ती गर्मी तथा शुष्क परिस्थितियां किसानों के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकती हैं। फसलों के चयन, सिंचाई की जरूरत और जल संरक्षण की योजनाओं में क्षेत्रीय जलवायु को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। दूसरी ओर, कोंकण में अधिक नमी और गर्मी का मेल नागरिकों के लिए असुविधाजनक परिस्थितियां पैदा कर सकता है। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या महाराष्ट्र की कृषि, जल प्रबंधन और शहरी विकास नीतियां बदलती जलवायु के अनुरूप तैयार की जा रही हैं?
बदलती जलवायु की चुनौती, सरकार बनाए ठोस कार्ययोजना
वैज्ञानिक अध्ययन दीर्घकालीन रुझानों को समझने में मदद करता है। हालांकि, इससे किसी एक वर्ष की गर्मी, बारिश या सूखे का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अब जरूरत है कि सरकार जिलावार जलवायु जोखिम का आकलन करे और उसके आधार पर किसानों तथा नागरिकों के लिए ठोस अनुकूलन योजनाएं बनाए।

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