संजय राऊत
`भारत में अराजकता फैलाने की कोशिश होने का ढोल भाजपा के अंधभक्त पीट रहे हैं। उन्हें किस बात का डर सता रहा है? फ्रांस, बेल्जियम, इटली समेत कई देशों में जनता सड़कों पर उतर आई है। अल्बानिया में जनता ने संसद और सुप्रीम कोर्ट को आग के हवाले कर दिया। ऐसा क्यों हो रहा है, इस पर भाजपा परिवार को आत्मचिंतन करना चाहिए!’
भारत में एक सिद्धांतहीन, भ्रष्ट और संविधान की परवाह न करने वाली सरकार राज कर रही है। लोगों को लगता है कि ऐसी हुकूमत को जितनी जल्दी हो सके उखाड़ फेंकना चाहिए। यह विचार राष्ट्रहित में है। सरसंघचालक मोहन भागवत के कहे अनुसार, राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले अराजकता को हवा दे रहे हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। देश में अराजकता पैâलाने का काम जिन नरेंद्र मोदी, अमित शाह वगैरह लोगों ने पिछले दस-बारह सालों में किया, उन्हीं मोदी-शाह को समर्थन देने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किया और अब वही बात संघ के गले की हड्डी बन गई है। संघ के दशहरा सम्मेलन में इस बार पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को बतौर चीफ गेस्ट बुलाया गया। मोदी-शाह के लिए इसे एक बड़ा झटका माना जाना चाहिए। एक तो मोदी-शाह के दबाव के कारण धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद से ‘दांव’ अधूरा छोड़कर हटना पड़ा। धनखड़ राज्यसभा चेयरमैन के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी की पूरी चमचागीरी कर रहे थे। उनकी सेवा में कोई कमी नहीं थी। राज्यसभा में विपक्ष की आवाज दबाने का काम वे पूरी वफादारी से कर ही रहे थे, लेकिन पर्दे के पीछे से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मनचाहा ‘रेजिम चेंज’ का एजेंडा भी लागू कर रहे थे। उस काम में संघ की उन्हें शह हासिल थी। मोदी-शाह ने उन्हें रातों-रात उपराष्ट्रपति पद से हटा दिया। यह संघ के लिए झटका था। धनखड़ को पूर्व उपराष्ट्रपति के तौर पर जो सुविधाएं मिलनी चाहिए थीं, वे भी उन्हें नहीं दी गर्इं। सरकार ने धनखड़ को घर नहीं दिया, कार्यालयीन सहायक नहीं दिए, पेंशन नहीं दी। धनखड़ छतरपुर में एक मित्र के फार्महाउस पर रह रहे हैं। मोदी-शाह द्वारा किनारे लगाए गए जगदीप धनखड़ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विजयादशमी समारोह में मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया, यह बहुत अच्छा हुआ।
इसके पीछे संदेश यही है कि संघ अब मोदी-शाह की परवाह नहीं करता।
यह सरकार नहीं चाहिए
जनता को मोदी-शाह की यह भ्रष्ट और बेपरवाह सरकार नहीं चाहिए और युवा लड़कों ने इसके खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया है। भारत की चुनाव प्रणाली पूरी तरह सड़ चुकी है और राजीव कुमार, ज्ञानेश कुमार जैसे चुनाव आयुक्तों ने मोदी-शाह के पाप कर्मों के ‘वाहक’ के रूप में काम किया। इसलिए सबसे पहले चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को जाना होगा। ज्ञानेश कुमार ने समझदारी दिखाते हुए इस्तीफा नहीं दिया, तो देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी। महंगाई, हुक्मरानों की मनमानी और चुनावी घोटालों के खिलाफ ‘यूरोप’ के कई देशों में जनता सड़कों पर उतर आई है। प्रâांस सुलग रहा है। इटली में जनता श्रीमती मेलोनी की सरकार को झकझोर रही है। इटली के कई प्रमुख शहरों में आगजनी जारी है। अल्बानिया एक छोटा-सा देश है। वहां अवाम की नाराजगी का विस्फोट हुआ है। भ्रष्ट शासन व्यवस्था को संरक्षण देने वाले वहां के सुप्रीम कोर्ट की इमारत में आग लगा दी गई। लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाए, तो ऐसी ‘आगजनी’ शुरू होती है। यह अराजकता है और भारत में ऐसी अराजकता पैदा करने की कोशिशें चल रही हैं, ऐसा ‘भाजपा’ के लोग कह रहे हैं। उन सभी ने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। देश बड़ा हो या छोटा, जनता के मन में तानाशाही के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा जगना अहम है। पड़ोसी श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश में यही प्रेरणा जागी। बांग्लादेश के चुनाव आयुक्त को गुस्साई जनता ने घसीटकर घर से बाहर निकाला। गले में जूतों की माला पहनाकर उसका सरेआम जुलूस निकाला गया और आज जनाब ढाका की जेल में सड़ रहे हैं। बांग्लादेश के चुनाव आयुक्त ने भारत के ज्ञानेश कुमार और राजीव कुमार की तरह कई ‘पाप कर्म’ किए थे और वहां के भ्रष्ट शासकों की जीत में हाथ बटाया था। भारत की जनता अंधी नहीं है। यूरोपीय देशों से लेकर एशियाई महाद्वीप के देशों तक, जनता को लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरते हुए वह देख रही है। मोदी के अंधभक्तों को अगर यह अराजकता लगती है, तो यह उनकी बुद्धि का दोष है।
हाहाकार
अल्बानिया यूरोप का एक छोटा सा देश है। वहां आंदोलनकारियों ने संसद, मंत्रालयों और सुप्रीम कोर्ट को आग लगा दी। उससे जुड़े ‘वीडियो’ मैंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए। दुनिया में क्या चल रहा है और जनता वैâसे तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतर रही है, यह मैंने बताया। मैंने यह विचार व्यक्त किया कि भारत को सावधानी बरतनी चाहिए। इस पर भाजपा के अंधभक्तों ने स्यापा मचाना शुरू कर दिया कि संजय राऊत अराजकता का समर्थन कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट को धमका रहे हैं। अंधभक्तों ने अपना फर्ज निभाया, लेकिन अल्बानिया में भड़की इस आगजनी की जड़ में क्या है? अल्बानिया की संसद और सुप्रीम कोर्ट को लोगों ने तबाह कर दिया। शिक्षा महकमे पर कब्जा कर लिया। ऐसा क्यों हुआ, इस पर मोदी-शाह के अंधभक्तों को मंथन करना चाहिए। अल्बानिया की मौजूदा सरकार अवैध और भ्रष्ट है। देश की कीमती जमीनों को जारेड कुशनर (प्रेसिडेंट ट्रंप के जमाई) को बेचा जा रहा है। इसमें कई किसान और स्थानीय निवासी पिस गए हैं। लोग सुप्रीम कोर्ट गए, तो वहां भी सरकारी दबाव और भ्रष्टाचार व्याप्त है। जिसके चलते किसानों के साथ अन्याय हुआ। विदेशी ताकत को देश की सार्वजनिक संपत्ति बेचे जाने के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई और उसी जनाक्रोश में संसद व सुप्रीम कोर्ट को आग के हवाले कर दिया गया। भारत में इस तरह की अराजकता पैदा हो, ऐसा कोई नहीं चाहेगा, लेकिन वैश्विक घटनाओं का संदर्भ देना भी भाजपा को मंजूर नहीं है और वे अब हाहाकार मचा रहे हैं।
कमजोर नेता
मोदी-शाह और उनकी सरकार अब कमजोर हो चुकी है। डर का ब्रह्मराक्षस उनकी गर्दन पर सवार है। मोदी-शाह को इस बात का डर सता रहा है कि लोग भारी तादाद में सड़कों पर उतरकर उन्हें घेर लेंगे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा। इसी वजह से वे मच्छर, कॉकरोच और चूहों तक से डर रहे हैं। मोदी और शाह १२ सालों से शौर्य और मर्दानी हुंकार भर रहे थे। असल में उनकी गत यह हो गई है कि शरीर शेर का है और कलेजा चूहे का।
देश में फिलहाल जो हालात बने हैं और जिसकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह खौफ में बैठे हैं, वे हालात उन्होंने खुद ही पैदा किए हैं। इस बात के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू जिम्मेदार नहीं हैं, इस मौके पर बस इतना ही कहना है!
