मुख्यपृष्ठस्तंभझांकी: क्यों चूके डंकापति

झांकी: क्यों चूके डंकापति

अजय भट्टाचार्य

चीन ने भारत के गैर बासमती चावल निर्यात को बड़ा झटका दिया है। उसने करीब ७० प्रेषण यह कहकर खारिज कर दिए हैं कि ये आनुवंशिक रूप से संशोधित चावल उत्पाद हैं। लेकिन क्या भारतीय वाणिज्य मंत्री ने इस बारे में कुछ कहा? मार्च २०२६ में चीन ने पहले ३ प्रेषण निरस्त कर दिए थे। जापान ने भी मार्च २०२६ में भारतीय आमों को खारिज कर दिया था। चीन ने मार्च २०२६ में चावल वापस भेजना शुरू कर दिया था। तो फिर भारतीय मीडिया ने तब से इस खबर को क्यों दबाया। केंद्र सरकार ने इस बारे में क्या किया? जैसे इटली की प्रधानमंत्री को चॉकलेट दी, वैसे ही उसने जापान और चीन के प्रधानमंत्री को चॉकलेट क्यों नहीं दी? अगर महामानव का दुनिया में इतना असर है तो ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं? इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने विश्वगुरु की सोच को देखकर इंस्टाग्राम पर अनफॉलो कर दिया। क्या ये तीनों देश डंकापति के दबदबे वाली दुनिया का हिस्सा नहीं हैं!
नाम नया सोच पुरानी
कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में बीते रविवार को एक आदमी वीआईपी के लिए ट्रैफिक रोकने से नाराज होकर बीच रोड पर धरने पर बैठ गया। ओल्ड एयरपोर्ट रोड से राज्यपाल का काफिला गुजरने वाला था इसलिए ट्रैफिक को रोका गया था। इसमें एक आदमी अपनी गर्भवती पत्नी के साथ यात्रा कर रहा था। वीवीआईपी मूवमेंट के लिए लागू जीरो-ट्रैफिक प्रोटोकॉल के कारण वह परेशान हो गया। कुछ दिन पहले मुंबई में भी एक महिला बीजेपी के प्रदर्शन के दौरान नाराज हो गई थी। उसने भीड़ के सामने ही पुलिसकर्मियों की क्लास लगाई थी। वीवीआईपी कल्चर को खत्म करने का दावा करनेवाली पार्टी ने राजभवन का नाम बदलकर भले लोकभवन कर दिया हो, मगर लोकभवन में रहनेवालों की मानसिकता पूर्ववत है।
साकेत में मुक्ति
दिल्ली के साकेत में एक इमारत गिरने से ६ लोगों की मुक्ति हो गई, जिनमें मेडिकल और इंजीनियरिंग के ५ युवा छात्र भी शामिल थे। दिल्ली पुलिस ने मार्च में दिल्ली नगर निगम को दो बार ऊपरी मंजिल पर हो रहे अवैध निर्माण के बारे में आगाह किया था, लेकिन भाजपा के नियंत्रण वाले दिल्ली नगर निगम ने इसे नजरअंदाज कर दिया। अलबत्ता इस मामले में दो इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया है। क्या इन बच्चों की मौत के लिए निलंबन ही सजा है? जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। भाजपा की नाकामियों की वजह से लोग कब तक यूं ही मरते रहेंगे!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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