कहने में समतल धरातल समाज का
वास्तविकता में अति ऊबड़-खाबड़
एक वर्ग चलता मस्त चाल
उसी राह दूसरे के पांव लहूलुहान।
घोषणाओं में नारी पुरुष बराबर
वास्तविकता में दिखता कुछ और
केवल अवतारी रूप में पुजती नार
धरातल पर रोंदी जाती बारम्बार।
आशाएं टूटती नहीं केवल तन की
आकांक्षाएं मरती हरदम मन की
धूल सी बिछती रहती तू
नारी बार-बार क्यों झड़ती रहती तू।
छुट जाता तेरा अपना मायका
जुड़ जाता संबंध अनजाने लोगों से
आती अकेली, छोड़ सब अपने
केवल एक के सहारे नये रिश्ते में।
सबके तरकश में प्रश्न बहुत सारे
तू कब तक अपनी इच्छाएं मारे।
घर में पत्नी बन घुटती
बाहर तेरी मर्यादा लुटती
बच्ची से वृद्धा तक जलती
बंद संदूकों में तेरी देह सड़ती
लेते जन्म झाड़ियों में फिकती।
बेटों को बचपन में सिखाओ
नारी के सब रूप पुजवाओ
बेटी-बेटे में समता रखो
बेटों की मर्यादाएं खींचों
बलात्कारी को दंडित करो
कभी उसका मान मंडन न हो।
अपराधों में सबसे अव्वल अपराध
केवल मृत्यु दंड का हो व्यवधान।
बेटियों तुम भी सद्बुद्धि पाओ
अपनी मर्यादाओं को निभाओ
करो अपने नारित्व का स्वयं सम्मान
तभी कसी जाएगी समाज की कमान
नारियों लो मशाल अपने हाथ में
कदम उठाओ अपने सम्मान में।
-बेला विरदी
