सैयद सलमान मुंबई
बिहार में मुसलमानों की राजनीतिक आवाज अब पहले से कहीं अधिक कमजोर हो चुकी है। २०२५ के बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजे मुस्लिम समाज के लिए चिंता का विषय हैं। राज्य में मुसलमानों की लगभग १८ प्रतिशत आबादी है, लेकिन विधानसभा में उनकी संख्या इस बार घटकर सिर्फ ११ विधायक रह गई है, जबकि १९८५ में यह संख्या ३४ तक थी। १९५२ से अब तक बिहार के चुनावी इतिहास में यह मुस्लिम प्रतिनिधित्व का सबसे निचला स्तर है। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि वर्षों की साजिशों, रणनीतियों, राजनीतिक खेलों और भाजपा की बहुसंख्यकवादी राजनीति का नतीजा है जो मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लगातार कमजोर कर रही है। भाजपा ने स्पष्ट रूप से मुसलमानों को राजनीतिक तौर पर सीमित करने की रणनीति अपनाई है।
मुस्लिम समाज को नुकसान!
हर मोर्चे पर मुसलमानों को हाशिए पर डालने के नतीजे सामने आने लगे हैं, लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि राजद, कांग्रेस और जनता दल यूनाइटेड जैसे अन्य बड़े दल भी अब मुसलमान उम्मीदवारों के चयन में पीछे हट रहे हैं। जाहिर है टिकट कम तो विजयी उम्मीदवारों की संख्या भी कम होगी। इस बार राजद के १८ मुस्लिम उम्मीदवारों में से केवल ३ विजयी हुए, कांग्रेस के १० में से २ और जनता दल के ४ में से १ ही विधायक बन पाया है। भाजपा ने एक भी मुसलमान उम्मीदवार को मौका नहीं दिया।
इस संदर्भ में मुस्लिम नेतृत्व की सियासी स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी दौरान सीमांचल क्षेत्र में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने मजबूत वापसी की है। पार्टी ने इस बार २५ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, जिनमें ५ मुस्लिम विधायक साफ तौर पर विजयी हुए। सीमांचल क्षेत्र मुस्लिम आबादी का केंद्र माना जाता है और यहां इस बार एआईएमआईएम ने यूपीए और एनडीए दोनों से अधिक मुस्लिम विधायक जिताए हैं। हालांकि, यह जीत क्षेत्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका बड़ा प्रभाव पूरे राज्य में मुस्लिम मतदाताओं के मतों में विभाजन के रूप में देखा जा सकता है। २०२० में एआईएमआईएम के पांच विधायक थे, जिनमें से चार बाद में राजद में शामिल हो गए थे। इस बार भी एआईएमआईएम ने सीमांचल की राजनीति को नया मोड़ दिया है। पुराने दलों ने ओवैसी को कट्टरपंथी करार देते हुए राजनीतिक बहस से बाहर रखा, लेकिन मुस्लिम मतों के इस बंटवारे की जिम्मेदारी उन दलों पर भी आती है। एमआईएम की गतिविधियों ने मुस्लिम नेतृत्व के उभार को और कमजोर किया है, जिसका नतीजा सीधे तौर पर मुस्लिम समाज को नुकसान पहुंचा रहा है।
समाधान खोजने का वक्त!
यह सोचने का विषय है कि बिहार जैसा राज्य, जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है, क्यों आज भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व मात्र वोटों तक सिमटा हुआ है? क्या मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक एजेंडा तय करना, अपनी समस्याओं पर गंभीर विमर्श करना उनके लिए अब कठिन होता जा रहा है? क्या राजनीतिक नेताओं पर निर्भरता और नेता-परस्त मानसिकता ने उन्हें अपनी सक्रिय भूमिका से दूर कर दिया है? यह स्थिति एक उलझन की तरह है, जो मुस्लिम समाज के विकास में बाधक बन रही है। मुस्लिम नेतृत्व को यह समझने की जरूरत है कि भावनात्मक राजनीति, नारेबाजी तथा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से कोई फायदा नहीं होता। इसके विपरीत, इससे हमेशा नुकसान ही हुआ है। हर बार जब मुसलमान अपनी राजनीतिक ताकत को महसूस कर उसे स्वाभाविक नेतृत्व देने की जगह भावनात्मक और सांप्रदायिक आधार पर पैâसले करते हैं, तब वे पीछे रह जाते हैं। सच्चाई यह है कि अगर मुस्लिम समाज सशक्त, शिक्षित और मजबूत संगठनात्मक ढांचे के साथ आगे आएगा, तभी उसकी राजनीतिक मांगें प्रभावी बनेंगी। बिहार के उदाहरण से यह साबित होता है कि जब तक मुस्लिम समाज अपनी शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास जैसी असली समस्याओं पर जोर नहीं देगा, तब तक राजनीतिक दल केवल चुनावों में मुस्लिम चेहरों को टोकन बनाकर मैदान में उतारेंगे, पर वास्तविक सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिलेगी।
वक्त का तकाजा है कि मुसलमान इस स्थिति से बाहर निकलें और आत्मचिंतन करें। यह समय शिकायत करने या आरोप-प्रत्यारोप करने का नहीं, बल्कि अपने लिए ठोस समाधान खोजने का है। कट्टर धार्मिक और भावुक राजनीति को छोड़, साझा विकास के रास्ते पर चलने की जरूरत है। अपने आप को किसी राजनीतिक दल का वोट बैंक समझने की मानसिकता छोड़ देनी चाहिए और खुद अपने मुद्दों का नेतृत्व करना होगा। तब जाकर बिहार के मुसलमान पुन: अपनी खोई हुई राजनीतिक उपस्थिति और सामाजिक सम्मान हासिल कर पाएंगे। उनकी आवाज फिर से लोकतंत्र की चौखट पर दृढ़ता से सुनाई देगी और वे केवल वोटर की भूमिका से आगे बढ़कर राजनीतिक भागीदारी का असली एजेंडा तैयार कर सकेंगे।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
