मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : लोकतंत्र की दहलीज पर मताधिकार का संहार!

इस्लाम की बात : लोकतंत्र की दहलीज पर मताधिकार का संहार!

सैयद सलमान, मुंबई

पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एघ्R) प्रक्रिया ने लाखों मतदाताओं को वोट डालने के अधिकार से महरूम कर दिया है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, कुल २७ लाख नाम न्यायिक जांच के बाद अंतिम सूची से कट चुके हैं, जबकि ६० लाख से ज्यादा पर अपीलें लंबित हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एसआईआर के नाम पर जो कुछ घट रहा है, वह केवल चुनावी जोड़-घटाव नहीं बल्कि लोकतांत्रिक नागरिकता के साथ एक क्रूर मजाक है।
टार्गेट मुस्लिम आबादी!
मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ के नाम पर इस तरह लाखों लोगों के नाम हटा देना किसी तकनीकी प्रक्रिया से ज्यादा एक गहरी राजनैतिक सर्जरी है, जिसने बंगाल के सामाजिक ताने-बाने को हिलाकर रख दिया है। चुनाव आयोग के आंकड़े तस्दीक करते हैं कि इन आंकड़ों के पीछे छिपी पीड़ा उन लाखों परिवारों की है जिन्हें एक झटके में बेगाना बनाने की कोशिश की गई है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे भयावह पहलू इसका सांप्रदायिक इस्तेमाल है। आंकड़ों का विश्लेषण करें तो साफ झलकता है कि इस चुनावी ‘सफाई’ अभियान की गाज सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी पर गिरी है। नंदीग्राम जैसे क्षेत्रों में, जहां मुस्लिम आबादी महज २५ प्रतिशत है, वहां मतदाता सूची से हटाए गए नामों में ९५ प्रतिशत से अधिक मुस्लिम हैं। राज्य के मुस्लिम बहुल जिलों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में जिस बड़े पैमाने पर नाम काटे गए हैं, वह किसी संयोग का हिस्सा नहीं लगता। जब राज्य की लगभग २७ से ३० प्रतिशत मुस्लिम आबादी के मुकाबले सूची से हटाए गए नामों में उनका अनुपात अप्रत्याशित रूप से कहीं ज्यादा हो तो सरकार और चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।
इसे महज मतदाता सूची का सुधार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह सरासर एक खास समुदाय को हाशिए पर धकेलने का कुटिल रणनीतिक प्रयास है। विडंबना यह है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के नाम पर उन बंगाली मुसलमानों को प्रताड़ित किया जा रहा है जो पीढ़ियों से इसी मिट्टी का हिस्सा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के लिए बंगाल की सत्ता एक ऐसा किला है, जिसे फतह करने के लिए वह ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की हर सीमा लांघती दिख रही है। हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता का सपना दिखाने और बंगाली मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’ बताकर उनके अधिकार छीनने का यह दोहरा खेल सामाजिक विभाजन की एक नई और खतरनाक इबारत लिख रहा है। इस आग की लपटें पूरे देश को अपनी चपेट में ले सकती हैं।
खामोशी सवालों के घेरे में!
इस मुद्दे पर संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी और संदिग्ध सक्रियता इस मामले को और गंभीर बनाती है। जिस पर निष्पक्ष चुनाव कराने का जिम्मा है, उस चुनाव आयोग जैसी संस्था की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। १९ न्यायाधिकरणों की बैठकें तो शुरू हो गई हैं, लेकिन जिस रफ्तार से अपीलें बढ़ रही हैं और जिस सुस्ती से सुनवाई का ढांचा तैयार किया गया है, उससे न्याय की उम्मीद कम और खानापूर्ति ज्यादा नजर आती है। जब तक ये न्यायाधिकरण किसी नतीजे पर पहुंचेंगे, तब तक चुनावी प्रक्रिया अपना रास्ता तय कर चुकी होगी और लाखों वैध मतदाता अपने बुनियादी हक से वंचित रह जाएंगे। भाजपा यही चाहती है और चुनाव आयोग उसी लाइन पर काम कर रहा है। भाजपा और चुनाव आयोग के इस गठबंधन का खामियाजा आगे चलकर पूरे देश के मुसलमानों को भुगतना पड़ सकता है।
राजनीतिक दलों की भूमिका भी कम संदेहास्पद नहीं है। तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस इस मुद्दे पर तीखे बयान तो दे रहे हैं, लेकिन प्रशासन और व्यवस्था पर इसका कोई ठोस असर दिखाई नहीं देता। सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस को अपने वोट बैंक की चिंता है और भाजपा को ध्रुवीकरण की, लेकिन इस सियासी रस्साकशी के बीच पिस रहा है वह आम मुसलमान जो अपनी नागरिकता और पहचान के दस्तावेज लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। यह स्थिति हेट स्पीच से कहीं ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह व्यवस्थागत प्रताड़ना है।
अगर समय रहते विपक्षी पार्टियों और नागरिक समाज ने इस भेदभावपूर्ण प्रक्रिया के खिलाफ निर्णायक मोर्चा नहीं खोला तो मुस्लिम समाज पूरी तरह से मुख्यधारा से कट जाएगा। किसी भी लोकतंत्र में एक बड़े समुदाय का अलगाव न तो देशहित में होता है और न ही सामाजिक सुरक्षा के हित में। बांग्लादेशी घुसपैठ के नाम पर अपनों को बेगाना करने की यह जिद बंगाल को अशांति की उस खाई में धकेल सकती है जिससे उबरना नामुमकिन होगा। सत्ता की भूख के लिए नागरिक अधिकारों की बलि देना लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा है। आज जरूरत इस बात की है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में हस्तक्षेप करे और यह सुनिश्चित करे कि चुनावी राजनीति की वेदी पर किसी भी भारतीय नागरिक की पहचान और मताधिकार का कत्ल न हो।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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