मुख्यपृष्ठस्तंभतरकश: यहां पर सब शुद्ध और पवित्र मिलता है!

तरकश: यहां पर सब शुद्ध और पवित्र मिलता है!

धनुर्धर

उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली हुई। सुनते हैं जोरदार हुई। उसके बाद कुछ न कुछ तो करना था। सो, रैली की जगह पर वहां के रामलीला ग्राउंड में यज्ञ और हवन किए गए। मकसद था उस जगह को ‘शुद्ध’ करना। आप यह मत पूछिए कि खड़गे जी के रैली करने से क्या वह जगह ‘अशुद्ध’ हो गई थी? ऐसे सवाल नहीं किए जाने चाहिए। ये सवाल हमारी संस्कृति की महानता को कम करते हैं।
देवियां और परमेश्वर
अपनी हजारों साल की भारतीय संस्कृति में सब कुछ शुद्ध और पवित्र ही है। कुछ भी अपवित्र नहीं। यहां महिलाएं देवियां होती हैं और पति सारे परमेश्वर। जन्म के आधार पर ब्राह्मण पूजित होते रहे हैं, लेकिन उनको पूजने वाले भी महान ही रहे हैं। भूलकर भी कभी यह न सोचिए कि जिन लोगों के स्पर्श मात्र से ऐसे पवित्र लोग दूषित हो जाते थे या उनके दूषित होने की संभावना रहती थी, वे लोग भी इसी देश और संस्कृति का हिस्सा हुआ करते थे। अगर आप सोचेंगे तो कभी पूछ बैठेंगे कि क्या हमारी संस्कृति में कभी छुआछत जैसी घृणित परंपरा भी थी? देखिए आ गए ना संस्कृति की महानता को कम करनेवाले सवाल पर।
संसद में खींच लाए
यही वजह है कि रैली के बाद रामलीला ग्राउंड के ‘शुद्धीकरण’ का बीड़ा उठानेवाले लोगों ने भी यह नहीं कहा कि खड़गे जी के रैली करने से वह जगह अशुद्ध हो गई थी। इससे बात छुआछूत की तरफ निकल सकती थी। इसलिए मीडियाकर्मियों के पूछने पर बड़ी सफाई से इतना ही कहकर काम चला लिया कि राजनीतिक गतिविधियों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए यह धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। लेकिन खड़गे जी कब माननेवाले थे। संसद में यह मुद्दा खींच लाए।
बरगलाना मुश्किल
वैसे भी जो पीड़ित होता है, उसे बरगलाना आसान नहीं होता। खड़गे जी ने बचपन से यह पीड़ा झेली है, जातिगत पूर्वाग्रहों का दंश सहा है, सो तुरंत समझ गए कि इस ‘शुद्धीकरण’ की कवायद के पीछे कौन-सी सोच काम कर रही है। राज्यसभा में इस सोच को इतनी सफाई से बेनकाब किया कि किसी के लिए कोई परदादारी करना मुमकिन नहीं रह गया। बीजेपी के नड्डा साहब ने भी फरमाया कि हम इस तरह के कृत्यों का समर्थन नहीं करते और इसकी पूरी जांच कराएंगे।
लफड़ों से दूर
इसके तुरंत बाद प्रदेश बीजेपी नेताओं ने भी इस यज्ञ-हवन से खुद को अलग कर लिया। कह दिया कि इस तरह के लफड़ों में हम नहीं रहते। कहना पड़ा। पहले से थोड़े ही पता था कि यज्ञ-हवन से भी आलाकमान को प्रॉब्लम हो जाएगी। लेकिन हो गई प्रॉब्लम तो क्या करते। खैर, उस स्थिति में भी यह कहने से खुद को नहीं रोक सके कि खड़गे जी की रैली में धर्म विशेष के नारे लगे थे। यानी खड़गे जी के कारण नहीं तो धर्म विशेष के नारों के कारण तो अशुद्धि कुछ न कुछ हुई ही होगी। तो इस ‘शुद्धीकरण यज्ञ’ को आप चाहें तो इस रूप में देख लें।
फ्रस्ट्रेशन समझिए
वैसे संस्कृति के रक्षकों का फ्रस्ट्रेशन स्वाभाविक है। इतनी सारी सावधानी करने के बाद भी लोग सवाल उठा देते हैं। इन्हें ‘शुद्धि’ से भी दिक्कत है, ये ‘पवित्रता’ को भी बर्दाश्त नहीं कर सकते। पवित्रता तो दीपक की तरह होती है, उससे ज्योति निकलती रहती है, कमरा रोशन होता है। अपवित्रता के अंधकार को दूर करना क्या इतना गलत है?
अंधकार की स्ट्रैटिजी
असल में अंधकार की स्ट्रैटिजी बड़ी तगड़ी होती है। उसे पता है कि कमरे में अगर दीपक जल रहा है तो उसके लिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि वह उसी दीपक की शरण ले ले। दीया के नीचे वाली जगह ऐसी होती है, जहां से अंधकार को नहीं हटाया जा सकता। इसी तर्ज पर अशुद्धि और अपवित्रता के सारे पैरोकार ‘शुद्धीकरण’ की शरण लिए नजर आते हैं। संस्कृति, धर्म और राष्ट्र का ठेका ले लें तो कानून और संविधान के डंडों से बचना आसान हो जाता है।
अति की मजबूरी
वैसे भी पवित्रता की अति का गंदगी से सीधा नाता होता है। कहीं रास्ता चलते किसी सामान्य मनुष्य का पैर गंदगी पर पड़ जाए तो वह तत्काल उसे धोकर बात खत्म कर देता है। लेकिन पवित्रता की मारी आत्माएं इस सामान्य उपाय का अनुसरण नहीं कर पातीं। पहले उन्हें यह सवाल सताता है कि आखिर गंदगी उन तक पहुंच वैâसे गई। जो कुछ उनके पैरों में लगा है क्या वह वाकई गंदगी ही है और अगर हां तो वह किस तरह की गंदगी है। सो, अपनी जिज्ञासा का वेग कम करने के लिए वह पहले उस गंदगी को उंगली से स्पर्श करती हैं और फिर उंगली को नाक तक ले जाती हैं…।

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