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तरकश : राजाजी, मंदिरवा में चोरी…

धनुर्धर

जब से अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर से पैसे चुराने की खबर आई है, विरोधी और समर्थक दोनों बौराए घूम रहे हैं। कोई खुशी में तो कोई गम में। विरोधियों की खुशी छुपाए नहीं छुप रही। ‘हम तो पहले से कह रहे थे’ वाला विजयी भाव उनके चेहरे पर साफ झलकता है। वे छूटते ही बताने लगते हैं कि जो रामजी के नाम से ही अपनी दुकान चला रहे हों, करोड़ों रामभक्तों की आस्था की पूंजी से अपनी राजनीति चमका रहे हों, उनसे आप यह उम्मीद वैâसे कर सकते हैं कि मौका मिलने पर वे मंदिर में आ रहे चढ़ावे पर हाथ साफ नहीं करेंगे?
भक्तों में मायूसी
दूसरी ओर समर्थकों के चेहरे पर छले जाने का भाव दिखता है। मायूसी भरे स्वर में कहते हैं, कम से कम राम मंदिर को छोड़ देना चाहिए था। राम जी की कृपा से राजनीति चल ही रही थी चकाचक। दुनिया में भले ही भद पिट रही हो, देश भले रसातल की ओर चला जा रहा हो, लेकिन सत्ता पर तो कोई खतरा नहीं था। क्या अपने चेले-चपाटियों को इतना नहीं समझा सकते थे कि लूटने के लिए सारा देश पड़ा है, राम मंदिर को बख्श दो, कि सात घर तो डायन भी छोड़ देती है?
माया-मोह से परे
मगर ये विरोधी और समर्थक दोनों दूर-दूर वाले हैं। ये मंदिर वाली राजनीति का समर्थन या विरोध भले करते हों, उसे समझते नहीं हैं। ये कहते हैं भगवान राम की नकदी चुरा ली। अरे बाबा, नकदी भगवान राम के नाम पर आई, इसका मतलब ये थोड़े ही हुआ कि वह राम जी की हो गई। श्रीराम तो भगवान ठहरे, उन्हें माया-मोह से क्या लेना-देना। अपनी श्रद्धा, अपना विश्वास और अपनी समस्याएं लेकर भक्त आते हैं और मंदिर में चढ़ावा चढ़ा जाते हैं। वे भगवान को शीश नवाते हैं, भगवान उस श्रद्धा को स्वीकार कर लेते हैं, बाकी रहा चढ़ावा तो वह तो एक सांसारिक पदार्थ है।
सांसारिक मसला
उस सांसारिक पदार्थ का क्या करना है यह तो सांसारिक लोग देखेंगे। वही देखते हैं। अब सवाल सिर्फ यह है कि जो देखते हैं, उनके बीच हिस्सेदारी ठीक से बंटती है या नहीं। उसमें संतुलन बना रहे, इसकी भरपूर कोशिश रहती है। लेकिन कभी-कभी समीकरण बदलते हैं तो संतुलन भी बिगड़ता है। फिर उसे ठीक कर लिया जाता है। इस बार भी ठीक हो जाएगा संतुलन। बस याद रखने की बात यह है कि मामला भगवान श्रीराम का नहीं, सांसारिक पदार्थ के बंटवारे का है। मतलब कि यह लड़ाई पूरी तरह सांसारिक है।
करीबी भी खफा
मजे की बात यह कि जो करीबी लोग इस बात को समझते हैं, वे भी खफा हैं। उनकी तकलीफ दूसरी है। उनका कहना है कि यह पार्टी खुद को पार्टी विद ए डिफरेंस कहती रही है, दूसरों से अलग बताती रही है। वह है भी दूसरों से अलग। आप देखिए कि पिछली पार्टी की सरकारों में कोई घपला-घोटाला होता तो इस्तीफे लेने-देने का खेल शुरू हो जाता था। मगर जब से यह पार्टी आई है, विपक्षी लाख चिंचियाते रह जाएं, इस्तीफा न दिया जाता है और न लिया जाता है। ताजा उदाहरण धर्मेंद्र प्रधान का देख सकते हैं। नीट के पेपर लीक कोई पहली बार नहीं हुए हैं। हर बार हंगामा भी खूब मचा। लेकिन क्या मजाल कि उनका इस्तीफा हो जाए।
हिले हुए क्यों?
फिर इस बार ऐसी क्या मजबूरी है कि सब लोग हिले हुए नजर आने लगे? जो लोग हल्ला मचा रहे हैं, उन्हें मचाने दीजिए, कुछ समय में थक कर खुद ही शांत हो जाएंगे। आप धीरज धर कर बैठिए तो सही। जो जांच हो रही है, होने दीजिए। क्या बिगड़ जाएगा जांच से। सीसीटीवी वैâमरे हैं तो उन्हें ऑन या ऑफ करने की सुविधा भी तो है ही। वैसे भी आदरणीय ज्ञानेश कुमार जी रास्ता दिखा गए हैं। ४५ दिन के बाद फुटेज नष्ट किए जा सकते हैं। सुनते हैं वे भी रह चुके हैं अयोध्या वाली कमिटी में।
दूर रहने की हिदायत
पूरा मामला सेट है, फिर भी योगीजी बेचैन हैं। कह दिया, खुद आएंगे अयोध्या। यह भी कह दिया कि चोरी मामले में फंसे लोग बैठक में न आएं। हां, वे अपने किसी प्रतिनिधि को भेज सकते हैं। अब जो भी सेटलमेंट होना है, प्रतिनिधि के जरिए भी हो सकता है, लेकिन उन लोगों को मीटिंग से दूर रखने की जरूरत ही क्या थी? इससे तो विरोधियों का मन बढ़ता है और अपने लोगों का हौसला कमजोर होता है।
कच्चे खिलाड़ी
असल में ये करीबी लोग राजनीति के खेल में अभी पके नहीं हैं। कच्चे खिलाड़ी हैं वे। उन्हें पता नहीं कि बैठक से दूर रखने की हिदायत उन्हें नीचा दिखाने के लिए नहीं दी गई है। वैसे तो राजनीति में यह चलन है कि जो भी कोई फंसा हुआ दिखने लगे, उससे दूरी बढ़ा ली जाए। लेकिन आप ही सोचिए कि अगर उन लोगों को बचाना भी हो तो खुद से थोड़ा दूर तो दिखाना होगा ना। लेकिन सब्र कहां लोगों में कि चीजों को ढंग से समझने का प्रयास करें!
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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