क्या सुरक्षा से पल्ला झाड़ रही सरकार?
मुंबई की लोकल ट्रेनों में प्रतिदिन यात्रा करने वाले करीब ७५ लाख यात्रियों की जांच करना व्यावहारिक नहीं है, महाराष्ट्र सरकार का यह जवाब तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन जिस संदर्भ में यह दिया गया है, उसमें यह बेहद गैर-जिम्मेदाराना दिखाई देता है। सवाल यह नहीं है कि क्या प्रत्येक यात्री और उसके सामान की हवाई अड्डे जैसी जांच की जा सकती है। असली सवाल यह है कि लाखों यात्रियों की सुरक्षा के लिए सरकार के पास प्रभावी और व्यावहारिक व्यवस्था क्या है?
हाल ही में अंधेरी और बोरीवली के बीच चलती लोकल ट्रेन में मामूली विवाद के बाद २२ वर्षीय मयंक लोहार की चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोपी को सीसीटीवी और चेहरे की पहचान प्रणाली की मदद से कुछ घंटों में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन तकनीक का उपयोग अपराध के बाद आरोपी पकड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सुरक्षा व्यवस्था का पहला उद्देश्य अपराध को होने से रोकना होना चाहिए। सरकार ने विधानसभा में बताया कि १७७ रेलवे स्टेशनों पर लगभग ६,९०० सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और उनकी निगरानी २० जीआरपी थानों से की जाती है। पुलिस संदिग्ध व्यक्तियों की जांच भी करती है, लेकिन यदि स्टेशन परिसर और चलती ट्रेनों में हथियार लेकर प्रवेश करना इतना आसान है, तो इतने कैमरों और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विधानसभा अध्यक्ष ने भी लोकल ट्रेनों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नाराजगी जताते हुए सरकार से ठोस कार्ययोजना मांगी थी। इसके बाद जीआरपी ने बैगों की औचक जांच बढ़ाने की बात कही है। इससे स्पष्ट है कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि प्रत्येक यात्री की जांच संभव नहीं है। सरकार को यह बताना होगा कि संवेदनशील स्टेशनों की पहचान कैसे होगी, किस अनुपात में सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाएंगे और चलती ट्रेनों में गश्त कैसे बढ़ाई जाएगी। मुंबई लोकल की सुरक्षा के लिए हर यात्री की तलाशी जरूरी नहीं, लेकिन प्रमुख प्रवेश द्वारों पर मेटल डिटेक्टर, औचक बैग जांच, संदिग्ध गतिविधियों का तकनीकी विश्लेषण, सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी, महिला एवं प्रथम श्रेणी डिब्बों में नियमित गश्त और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली अनिवार्य है। ७५ लाख यात्रियों की संख्या सरकार के लिए बहाना नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का सबसे बड़ा कारण होनी चाहिए। देश की आर्थिक राजधानी की जीवनरेखा को भगवान भरोसे छोड़कर यह नहीं कहा जा सकता कि भीड़ अधिक है, इसलिए सभी की जांच संभव नहीं। सरकार से अपेक्षा जांच का दिखावा नहीं, बल्कि जोखिम के अनुपात में समझदार, दृश्यमान और जवाबदेह सुरक्षा व्यवस्था की है।
अपराध के बाद नहीं, पहले हो सुरक्षा
मयंक लोहार हत्याकांड ने साबित कर दिया कि सीसीटीवी से आरोपी पकड़ना पर्याप्त नहीं है। असली सफलता अपराध होने से पहले उसे रोकने में है। सरकार को बहाने नहीं, बल्कि संवेदनशील स्टेशनों पर कड़ी निगरानी, औचक तलाशी और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था का रोडमैप जनता के सामने रखना होगा।
