-बच्चों का भविष्य किसके हाथ?
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी-२०२६ का प्रश्नपत्र कथित रूप से डेढ़ करोड़ रुपए में बेचने की कोशिश ने राज्य की परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। २८ जून को होने वाली परीक्षा से ठीक पहले भिवंडी पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया। उनके पास से प्रश्नपत्र से मिलते-जुलते पन्ने बरामद होने का दावा किया गया, जिसके बाद परीक्षा स्थगित करनी पड़ी।
प्रारंभिक जांच में सामने आया कि आरोपी हिंदी, मराठी, गणित और सामाजिक विज्ञान के प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने का दावा कर रहे थे। पुलिस को आशंका है कि पेपर उत्तर प्रदेश स्थित प्रिंटिंग प्रेस से महाराष्ट्र के परीक्षा केंद्रों तक ले जाते समय लीक हुआ। यह संदेह सही निकला तो मामला केवल कुछ दलालों का नहीं रहेगा; छपाई, सीलिंग, परिवहन और भंडारण से जुड़े पूरे तंत्र की भूमिका जांचनी होगी। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब शिक्षक बनने की पात्रता ही खरीदे गए प्रश्नपत्र से तय होगी तो स्कूलों को योग्य शिक्षक वैâसे मिलेंगे? शिक्षक केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, वह बच्चों को ईमानदारी, अनुशासन और नैतिकता का भी पाठ देता है। लेकिन यदि उसकी नियुक्ति की नींव ही बेईमानी पर रखी गई तो इसका नुकसान केवल मेहनती अभ्यर्थियों को नहीं, पूरी पीढ़ी को होगा। डेढ़ करोड़ रुपए की कथित कीमत बताती है कि यह किसी एक उम्मीदवार को पेपर बेचने का सौदा नहीं था। आशंका है कि प्रश्नपत्र को कई अभ्यर्थियों या कोचिंग संस्थानों तक पहुंचाकर बड़ी कमाई की योजना बनाई गई थी। इसलिए आरोपियों के बैंक खातों, मोबाइल कॉल, डिजिटल भुगतान और शिक्षा विभाग से जुड़े संपर्कों की गहन जांच जरूरी है।
अब सरकार की परीक्षा
सरकार ने विशेष जांच दल गठित किया है, लेकिन केवल तीन गिरफ्तारियां पर्याप्त नहीं होंगी। यह सामने आना चाहिए कि प्रश्नपत्र पहली बार कहां से बाहर आया और किस अधिकारी, ठेकेदार या कर्मचारी की मिलीभगत थी। नई परीक्षा से पहले इलेक्ट्रॉनिक सील, जीपीएस निगरानी, बायोमेट्रिक पहुंच और प्रश्नपत्रों की रियल टाइम ट्रैकिंग लागू करनी होगी। अब सरकार की परीक्षा है, वह केवल नई तारीख घोषित करेगी या बच्चों का भविष्य बेचनेवाले पूरे नेटवर्क को बेनकाब करेगी?
