-तौसीफ कुरैशी
जनता से इतना डर क्यों? लोकतंत्र में लाठी, गिरफ्तारी और बंद मेट्रो का जवाब कौन देगा? संघी तो हैं ही, संघी विचारक भी कैसे बचाव कर रहे हैं, यह भी विचारणीय है। सत्ता हमेशा किसी की नहीं रही है और बेईमानी से हथियाई गई सत्ता तो बहुत बुरी तरह जाती है। सदियों तक नामोनिशान नहीं रहता नफरतियों का, तो इससे भी बुरा हाल होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसकी सियासी शाखा भाजपा को आपातकाल की बरसी पर लोकतंत्र की दुहाई देने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए। दूसरों के आपातकाल पर आंसू बहाना आसान है, लेकिन अपने शासन में जनता की आवाज़ से डरकर सड़कों पर सुरक्षा बल उतार देना लोकतंत्र की कौन-सी परिभाषा है? इतिहास की किताबों में दर्ज आपातकाल पर भाषण देने वालों को वर्तमान की सड़कों पर लिखी जा रही इबारत भी पढ़नी चाहिए या आगे पढ़नी पड़ेगी। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सुरक्षा बलों की भारी तैनाती, गिरफ्तारियों और नजरबंदीr की खबरें, मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियां और सार्वजनिक आवाजाही में बाधाएं, ये सब सवाल खड़े करते हैं। अगर जनता का विरोध इतना ही निरर्थक है, जैसा कि सत्ता के प्रवक्ता अक्सर बताते हैं, तो फिर उससे इतना डर कैसा? उसे बोलने दीजिए, नारे लगाने दीजिए और अपनी बात देश के सामने रखने दीजिए। लोकतंत्र में सरकारें सवालों का जवाब देती हैं, सवाल पूछने वालों के रास्ते बंद नहीं करतीं। खबरों के मुताबिक, कनॉट प्लेस से आईएनए और राजघाट तक लोग भारी तादाद में विरोध दर्ज कराने पहुंच रहे हैं। गिरफ्तारियां हो रही हैं, लेकिन आवाजाही और विरोध का सिलसिला थम नहीं रहा। यह केवल एक दिन के धरने का मामला नहीं है। यह उस बेचैनी का संकेत है, जो तब पैदा होती है, जब नागरिकों को लगता है कि उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें खामोश करने की कोशिश की जा रही है।
विडंबना देखिए कि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा ने १९७५ के आपातकाल को अपनी राजनीतिक स्मृति का स्थायी हथियार बना रखा है, उसी विचारधारा के शासन में विरोध के अधिकार को लेकर इतने सवाल उठ रहे हैं। क्या आपातकाल का विरोध केवल सत्ता से बाहर रहने वालों का विशेषाधिकार है? क्या लोकतंत्र की रक्षा का नारा विपक्ष के लिए है और सत्ता के लिए मनमानी का लाइसेंस? और जब संघी विचारकों की ओर से प्रदर्शनकारियों को देशद्रोही बताने, लाठियों से सबक सिखाने या धमकाने वाली आवाज़ें सुनाई देती हैं, तब सवाल और गंभीर हो जाता है। असहमति देशद्रोह नहीं होती। सरकार की आलोचना राष्ट्र का अपमान नहीं है। देश किसी पार्टी, संगठन या प्रधानमंत्री की निजी जागीर नहीं है। भारत का संविधान नागरिकों को केवल वोट देने का अधिकार नहीं देता, वह उन्हें सत्ता से सवाल पूछने का हक भी देता है।
इसी बीच विवेकानंद फाउंडेशन और उससे जुड़े विमर्श को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या नए राजनीतिक मुद्दों और अभियानों के बीच मतदाता सूची, चुनाव आयोग की निष्पक्षता तथा नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सरकार के प्रति जनता के असंतोष जैसे सवाल पीछे धकेले जा रहे हैं? इस आशंका की जाँच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। अन्ना आंदोलन के दौर में जो भ्रष्टाचार था ही नहीं, लेकिन संघियों के झूठ ने उसे सही कहलवा दिया था, जबकि अदालत में टिक नहीं पाए और सब बरी हो गए। लेकिन झूठ के सहारे भ्रष्टाचार-विरोधी जनाक्रोश ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी थी। उस आंदोलन का राजनीतिक लाभ किसे मिला, यह इतिहास का हिस्सा है।
विवेकानंद फाउंडेशन के जरिए फिर सीजेपी को हाइप दिलाने की कोशिशें की जा रही हैं, इस पर भी सवाल उठना लाज़िमी है। आरोप यह है कि ऐसे अभियानों के शोर में मोदी-शाह सरकार, चुनाव आयोग और ज्ञानेश गुप्ता की भूमिका को लेकर जनता के भीतर उठ रहे आक्रोश को दूसरी दिशा में मोड़ने की रणनीति काम कर रही है। अन्ना आंदोलन याद कीजिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे जनाक्रोश को इस तरह हवा दी गई कि राजनीतिक बदलाव की जमीन तैयार हो गई और अंततः उसका सबसे बड़ा लाभ योजनाबद्ध तरीके से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भाजपा के खाते में गया। अब भी सवाल वही है—क्या जनभावनाओं को किसी सुनियोजित अभियान के जरिए मोड़ने की कोशिश हो रही है? क्या सीजेपी के जरिए आक्रोश को किसी तरह बांटने की कोशिश की जा रही है? अगर ऐसा है, तो यह महज राजनीतिक प्रबंधन नहीं, जनता के विवेक को प्रभावित करने का खेल है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या उससे जुड़े आनुषंगिक संगठन यही करते आए हैं।
फर्क इतना है कि इस बार हर मुद्दे पर हिंदू-मुसलमान का कार्ड चलाकर असली सवालों से ध्यान हटाना आसान नहीं रह गया है। फिर भी सत्ता और संगठनों के बीच संबंधों, उनके राजनीतिक प्रभाव और जनमत को प्रभावित करने की कोशिशों पर सवाल पूछना जरूरी है। लोकतंत्र में किसी संस्था को आलोचना से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
आज असली संकट केवल भाजपा की लोकप्रियता या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक चिंता का नहीं है। संकट यह है कि क्या सत्ता अपने विरोधियों को नागरिक मानेगी या दुश्मन? क्या चुनाव आयोग द्वारा लोगों को मताधिकार से वंचित करने पर सवाल पूछना लोकतांत्रिक अधिकार रहेगा या नहीं? क्या जनता को अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए पुलिस की अनुमति से अधिक संविधान के संरक्षण पर भरोसा होगा? हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से हर राजनीतिक संकट का समाधान निकालने का दौर भी हमेशा नहीं चल सकता। महँगाई, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता और संस्थाओं की विश्वसनीयता के सवाल धार्मिक नारों से स्थायी रूप से नहीं दबाए जा सकते।
याद रखिए, जनता को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है, उसकी आवाज़ को हमेशा के लिए कैद नहीं किया जा सकता। आपातकाल का स्यापा करने वालों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की असली परीक्षा अतीत के अत्याचारों की निंदा में नहीं, वर्तमान में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में होती है। इतिहास का फैसला भाषणों से नहीं, आचरण से होता है। हम भी देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे। हर-हर… घर-घर… सत्यमेव जयते।
