-‘आस्था का चंदा, जवाबदेही का धर्म’
तौसीफ कुरैशी
राम का नाम लेते समय भारतीय समाज की आवाज बदल जाती है। उसमें राजनीति कम और श्रद्धा अधिक होती है। राम भारत की आत्मा हैं। इसलिए जब उनके नाम पर कोई काम होता है तो लोग जेब नहीं, मन खोलकर देते हैं। दान केवल रुपए का नहीं होता, विश्वास का भी होता है और विश्वास का पहला नियम है उसका हिसाब देना पड़ता है।
याद कीजिए वह समय, जब श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए देशभर में चंदा अभियान चल रहा था। कार्यकर्ता घर-घर पहुंचे। किसी से यह नहीं पूछा गया कि वह किस जाति का है, किस धर्म का है या किस पार्टी को वोट देता है। जिसने श्रद्धा से योगदान दिया, उसकी राशि स्वीकार की गई। मुसलमानों ने भी चंदा दिया। उनकी रसीदें बड़े गर्व से दिखाई गईं। अखबारों में खबरें छपीं, टीवी पर बहसें हुईं और मंचों से कहा गया कि देखिए, राम सबके हैं। यह केवल मंदिर नहीं, राष्ट्र की आस्था का उत्सव है। तब किसी ने नहीं कहा कि यह केवल हिंदुओं का मामला है।
लेकिन आज जब मंदिर से जुड़े ट्रस्ट के कामकाज पर सवाल उठे हैं, जब धन के इस्तेमाल को लेकर चर्चा हो रही है और एफआईआर दर्ज हो चुकी है, तब अचानक कुछ लोग कहने लगे ‘हिंदुओं का चंदा हिंदू खा गए, किसी और को क्या मतलब?’ यह वाक्य सुनकर लगता है कि जैसे सुविधा के अनुसार आस्था की परिभाषा भी बदल जाती है। जब चंदा लेना था, तब सब अपने थे। जब हिसाब देने की बारी आई तो कुछ लोग पराए हो गए। यह वैâसी नैतिकता है? और फिर सबसे बड़ा सच तो यह है कि सवाल किसी बाहर वाले ने नहीं उठाए। शिकायत भी हिंदू समाज के लोगों ने की है। एफआईआर भी उन्हीं की ओर से दर्ज कराई गई है। जिनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं वे भी वही लोग हैं, जिन्होंने वर्षों तक राम मंदिर आंदोलन को अपना आंदोलन माना। इसलिए यह कहना कि ‘दूसरों को क्या मतलब’, केवल तथ्य से नहीं, समाज की बुद्धि से भी खिलवाड़ है। धर्म का सबसे बड़ा शत्रु अधर्म नहीं, पाखंड होता है। अधर्म सामने दिखाई देता है इसलिए उससे लड़ना आसान होता है, लेकिन पाखंड धर्म का वस्त्र पहनकर आता है और उसी की आड़ में प्रश्न पूछने वालों को कटघरे में खड़ा कर देता है। आज भी वही हो रहा है। सवाल उठाने वाले से पूछा जा रहा है कि तुम्हारी नीयत क्या है, जबकि पूछा यह जाना चाहिए कि जिन पर सवाल हैं, उनका जवाब क्या है। याद रखिए, यह कोई निजी परिवार की बैठक नहीं है। यह कानून के तहत पंजीकृत सार्वजनिक ट्रस्ट है। सार्वजनिक ट्रस्ट जनता के विश्वास से चलता है, किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं। उसके हर रुपए पर जनता का नैतिक अधिकार है। सवाल पूछना लोकतंत्र का अपराध नहीं, उसका सबसे बड़ा संस्कार है। कुछ लोग कहते हैं कि यह घर का मामला है, लेकिन कानून घर और बाहर का फर्क नहीं करता। अगर किसी घर में हत्या होती है, तो पुलिस यह नहीं कहती कि परिवार बैठकर निपटा ले। अदालत यह नहीं पूछती कि मरने वाला किसका रिश्तेदार था। कानून केवल यह देखता है कि सच क्या है। फिर करोड़ों लोगों की आस्था और सार्वजनिक धन से जुड़े मामले में यह कैसे कहा जा सकता है कि ‘आपको क्या मतलब?’ राम ने कभी यह नहीं कहा कि अपने लोगों के लिए अलग न्याय होगा और दूसरों के लिए अलग। उन्होंने तो अपने जीवन से यह बताया कि न्याय सबसे पहले अपने ऊपर लागू होता है।
यही कारण है कि वे केवल भगवान नहीं, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। यदि उनके नाम पर बनी संस्था भी मर्यादा से ऊपर मान ली जाएगी तो सबसे बड़ा अन्याय राम के साथ होगा।
मंदिर की रक्षा पत्थरों से नहीं होती, चरित्र से होती है। ऊंचे शिखर बनाने से श्रद्धा नहीं बढ़ती, पारदर्शिता से बढ़ती है। सवालों को दबाने से आस्था सुरक्षित नहीं होती, बल्कि संदेह गहरा होता है। जो संस्था अपने ऊपर उठे प्रश्नों का उत्तर तथ्यों और ईमानदारी से देती है, वही लंबे समय तक सम्मान पाती है।
इसलिए आज आवश्यकता किसी को चुप कराने की नहीं, सच को सामने लाने की है। यदि कोई अनियमितता नहीं हुई है तो निष्पक्ष जांच सबसे पहले उन लोगों के हित में होगी, जिन पर आरोप लगे हैं। और यदि कुछ गलत हुआ है तो उसे छिपाना राम के नाम का नहीं, राम के नाम पर मिले विश्वास का अपमान होगा।
राम का नाम नारे से बड़ा है। राम राजनीति से बड़े हैं। राम किसी दल, संगठन या व्यक्ति की जागीर नहीं हैं। जिस दिन हम यह भूल जाते हैं, उसी दिन राम मंदिर केवल इमारत रह जाता है और राम हमारी आत्मा से दूर चले जाते हैं।
राम को बचाने के लिए मंदिर बचाना जरूरी है, लेकिन मंदिर को बचाने के लिए उससे भी ज्यादा जरूरी है सत्य, मर्यादा और जवाबदेही को बचाना। क्योंकि राम वहीं रहते हैं, जहां सत्य से डर नहीं लगता। सत्यमेव जयते
