मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : खाड़ी की बंद होती सांसें और दुनिया की खुलती बेचैनी

तीर-ए-तौसीफ : खाड़ी की बंद होती सांसें और दुनिया की खुलती बेचैनी

तौसीफ कुरैशी

सुबह की समझ शाम तक बासी हो जाती है और शाम का सच अगली सुबह झूठ में बदल जाता है। राजनीति, कूटनीति और अर्थनीति की यह तिकड़ी अब तर्क से ज्यादा तात्कालिकता पर चलती दिखती है। जैसे कोई अदृश्य घड़ी है, जो हर पल अपने ही समय को काटती रहती है। इस बदलते समय में सच का वजन हल्का हो गया है और पैâसलों का शोर भारी।
बात भरोसे की!
इस्लामाबाद की एक बंद कमरे की बातचीत जहां उम्मीद थी कि कुछ रास्ता निकलेगा, वहीं से दुनिया के लिए एक और बंद गली निकल आई। अमेरिका और ईरान आमने-सामने बैठे, लेकिन शब्दों के पुल नहीं बन पाए। दोनों अपने-अपने सच के साथ लौट गए, लिफाफों में बंद कागज और मन में खुली आशंकाएं। एक कहता है, ‘परमाणु कार्यक्रम खत्म करो’, दूसरा पूछता है, ‘भरोसा पहले कौन देगा?’ और यहीं संवाद की डोर टूट जाती है। बातचीत का टूटना नया नहीं है, लेकिन उसके बाद उठे कदमों का अंदाज हमेशा चौंकाता है। अचानक एक घोषणा होर्मुज की खाड़ी बंद! यह वही खाड़ी है जिसे कुछ दिन पहले ‘सुंदर’ कहा गया था, जहां साझा रास्ते की बात हो रही थी। अब वही रास्ता दीवार बन गया है। यह सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन है और जब धड़कन को ही थामने की बात हो तो शरीर के हर हिस्से में बेचैनी पैâलना तय है। यहां सवाल सिर्फ ईरान और अमेरिका का नहीं है। यह उन तमाम देशों का है, जिनकी ऊर्जा की नसें इस खाड़ी से होकर गुजरती हैं। चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, इराक ये सभी उस ‘टोल’ व्यवस्था के सहारे अपने जहाज निकाल रहे थे। अब उस पर भी पहरा बैठ गया है यानी एक नाकाबंदी के ऊपर दूसरी नाकाबंदी। जैसे आग को बुझाने के लिए तेल डाला जा रहा हो।
कूटनीति का एक पुराना नियम है जहां संवाद खत्म होता है, वहां संघर्ष शुरू होता है। लेकिन आज के दौर में संवाद खत्म होने से पहले ही संघर्ष की भाषा बोलने लगती है। धमकियां पहले आती हैं, बातचीत बाद में। और जब बातचीत होती भी है तो वह समाधान के लिए नहीं, बल्कि अपनी-अपनी स्थिति दर्ज कराने के लिए होती है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प भूमिका उन देशों की है, जो खुद को ‘मध्यस्थ’ कह रहे हैं। रूस ने पहल की है, फोन उठाया है, बात की है।
लेकिन क्या आज की दुनिया में कोई भी देश पूरी तरह निष्पक्ष रह सकता है? हर मध्यस्थ के अपने हित हैं, अपनी सीमाएं हैं। और यही सीमाएं कूटनीति को जटिल बनाती हैं। चीन की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वह सीधे मैदान में नहीं उतरता, लेकिन अपने औजार दूसरों के हाथ में दे देता है। कंधे पर रखकर दागी जानेवाली मिसाइलें सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि संदेश हैं कि यह लड़ाई सिर्फ दो देशों की नहीं रहेगी। इसके असर की लहरें दूर तक जाएंगी। और इसी बीच, आम आदमी कहां है? वह पेट्रोल पंप पर खड़ा है, कीमतों के बोर्ड को देख रहा है। वह नहीं जानता कि इस्लामाबाद के कमरे में क्या हुआ, लेकिन उसे यह जरूर पता चल जाता है कि उसकी जेब पर क्या असर पड़ा। यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सच है ऊपर की राजनीति नीचे की जिंदगी को सीधे प्रभावित करती है। ‘खबर सिर्फ सूचना नहीं होती, वह समय की धड़कन होती है।’
हेकड़ी निकली!
आज की यह धड़कन तेज है, अनियमित है और थोड़ी डरावनी भी, क्योंकि इसमें स्थिरता नहीं है। हर पल कुछ बदल रहा है नीतियां, बयान, रिश्ते और रास्ते। होर्मुज की खाड़ी का बंद होना सिर्फ एक भौगोलिक घटना नहीं है। यह उस मानसिकता का प्रतीक है, जहां समाधान की जगह नियंत्रण को प्राथमिकता दी जा रही है। जहां बातचीत की जगह दबाव को हथियार बनाया जा रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि लड़ाई होगी या नहीं। सवाल यह है कि जब होगी तो उसका दायरा कितना बड़ा होगा। क्या यह सीमित टकराव रहेगा या फिर एक व्यापक संघर्ष का रूप ले लेगा? इतिहास गवाह है कि ऐसी चिंगारियां अक्सर बड़ी आग बन जाती हैं, लेकिन शायद सबसे बड़ा सवाल यह है क्या दुनिया ने संवाद की भाषा खो दी है? क्या अब हर समस्या का हल ताकत से ही निकलेगा? अगर ऐसा है तो यह सिर्फ एक क्षेत्र की नहीं, पूरी दुनिया की हार होगी और अंत में, वही विडंबना जिस खाड़ी को खोलने की कोशिश हो रही थी, उसे बंद करके खोलने की रणनीति बनाई जा रही है। यह उस दौर की पहचान है, जहां रास्ते सीधे नहीं, उलझे हुए हैं और उन उलझनों में ही दुनिया अपनी दिशा खोजने की कोशिश कर रही है। कुल मिलाकर यह भी कहा जा सकता है कि ईरान आज से ४०-४२ या ४५ दिन पहले जहां खड़ा वह सोच रहा था कि देश खत्म भी हो सकता है और पता नहीं क्या-क्या, लेकिन आज वह सीना ताने खड़ा है। दुनिया के दादा के सामने और दादा की भी हेकड़ी निकल गई है। वह किसी तरह इज्जत बचाने के रास्ते तलाश रहा है और दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि मैं हिटलरशाही नहीं कर रहा हूं। बातचीत से मसले का हल निकालने की कोशिश कर रहा हूं। रही बात ईरान के परमाणु बम बनाने या ना बनाने की पहली बात तो यह है उसने परमाणु बम बना लिया है या बनाने के करीब पहुंच गया है। ये तय मान लेना चाहिए कि वह परमाणु परीक्षण करने के समय का इंतजार कर रहा है और इजरायल-अमेरिका की यह कोशिश बेकार साबित होगी।
सत्यमेव जयते

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