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तीस्ता जल विवाद : ड्रैगन बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकियां…पानी रे पानी तेरा रंग कैसा…

मनमोहन सिंह

लीजिए साहब, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर एक और नया नाटक शुरू हो चुका है और इस बार कहानी लिखी जा रही है पानी की बूंदों से। खबर आई है कि बांग्लादेश में जल संकट गहराया तो वहां के दिग्गज नेता तारिक रहमान साहब ने बीजिंग की तरफ मुस्कुराकर देखना शुरू कर दिया है। इसे कहते हैं, प्यास लगी कुएं के पास जाने की, लेकिन कुआं खुद चलकर, ड्रैगन का रूप धरकर, कर्ज की बाल्टी लेकर आ गया! भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के पानी का बंटवारा सालों से एक ऐसी पहेली बना हुआ है जिसे सुलझाने में दोनों देश इतने मशरूफ रहे कि पड़ोसी चीन को ‘मछली पकड़ने’ का शानदार मौका मिल गया। अब बांग्लादेश के नीति-निर्धारकों को लगने लगा है कि गंगा-जमुना का पानी भले ही कम हो, लेकिन चीन के ‘चेकबुक’ का पानी कभी नहीं सूखता।
ड्रैगन की ‘वाटर थेरेपी’ और बांग्लादेश का झुकाव
व्यंग्य की बात यह है कि चीन, जो खुद ब्रह्मपुत्र का पानी रोकने के लिए तिब्बत में बांधों की कतार लगा रहा है, वह अब बांग्लादेश की प्यास बुझाने के लिए ‘मसीहा’ बनकर उभर रहा है। तारिक रहमान जी के हालिया संकेत तो यही कह रहे हैं, ‘अरे भाई, पानी नहीं दे सकते तो क्या हुआ, चीन से ‘लोन’ तो मिल रहा है!’
बांग्लादेश शायद भूल रहा है कि चीन की दोस्ती मुफ्त की ‘बिसलेरी’ नहीं है। यह वह मिनरल वॉटर है, जिसकी हर एक घूंट की कीमत बाद में बंदरगाहों और रणनीतिक ठिकानों को गिरवी रखकर चुकानी पड़ती है। श्रीलंका और पाकिस्तान ने भी कभी इसी चीनी ‘शरबत’ का स्वाद चखा था और आज तक उनका पेट खराब है।
‘पानी तुम दो, मलाई चीन खाएगा’
जब घर में पानी की किल्लत हो तो दूर के उस अमीर चाचा से हाथ मिला लो जो आपके आंगन में आकर अपना बोरवेल खोदना चाहता है। शायद इसी नीति पर बांग्लादेश की नई सियासी बिसात बिछाई जा रही है।
भारत के लिए यह एक कड़ा संदेश है। दिल्ली सोचती रह गई कि ‘अतिथि देवो भव:’, उधर चीन ने ‘लोन देवो भव:’ का कार्ड खेल दिया। अगर तारिक रहमान और बांग्लादेश की राजनीति वाकई तीस्ता के बहाने बीजिंग के ‘बेल्ट एंड रोड’ वाले जाल में तैरने को बेताब है तो भविष्य में पानी मिले न मिले, कर्ज का सैलाब आना तय है।
खैर, देखना दिलचस्प होगा कि चीन का यह ‘वाटर लव’ बांग्लादेश की प्यास बुझाता है या उसे हमेशा के लिए अपनी ‘डेट-ट्रैप’ (कर्ज के जाल) की नाव में सवार कर लेता है। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है, ‘पानी रे पानी तेरा रंग वैâसा… जिस देश का ‘चेक’ चमके, तू हो जाए वैसा!’

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