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खाली हैं दरबार सब…

देख सिकरी आगरा, सौरभ है हैरान।
खाली हैं दरबार सब, महल पड़े वीरान।।

कल जिनके आदेश पर, झुकता था संसार,
आज हवा से पूछते, अपना ही दरबार।
समय बदलते देर क्या, टूटे सब अभिमान—
खाली हैं दरबार सब, महल पड़े वीरान।।

सोने जैसे ताज थे, ऊँचे थे दीवान,
सत्ता-मद में डूबकर, भूले थे इंसान।
आखिर मिट्टी ने लिखा, जीवन का फरमान—
खाली हैं दरबार सब, महल पड़े वीरान।।

हाथी-घोड़े, शोर सब, खो बैठे पहचान,
दीवारों पर रह गई, बीते कल की तान।
राजसिंहासन रो रहे, सूना हर सम्मान—
खाली हैं दरबार सब, महल पड़े वीरान।।

‘सौरभ’ सत्ता देखकर, मत करना अभिमान,
कल का राजा आज हो सकता है अनजान।
समय सदा बलवान है, रखता यही विधान—
खाली हैं दरबार सब, महल पड़े वीरान।।

-डॉ. सत्यवान सौरभ

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