सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई हाई कोर्ट ने सोमवार को मेलघाट के आदिवासी इलाके में बच्चों और मांओं की मौत के लगातार मामलों के लिए राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि कुपोषण और हेल्थकेयर की कमियों को दूर करने के लिए पहले के कई कोर्ट के निर्देशों और कई कमिटी की रिपोर्ट के बावजूद, सरकार इसका समाधान निकालने में नाकाम रही है। जस्टिस रवींद्र घुगे और अभय मंत्री की डिवीजन बेंच कई पीआईएल पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें आदिवासी बच्चों में गंभीर कुपोषण और गर्भवती महिलाओं की मौतों, खासकर विदर्भ के मेलघाट और धरनी इलाकों की महिलाओं की मौत पर चिंता जताई गई थी।
अगस्त २०२१ में एक पिटीशनर ने कोर्ट को बताया था कि मेलघाट में सही मेडिकल सुविधाओं की कमी की वजह से लगभग ९०० बच्चे कुपोषण से मर सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह सिर्फ मेलघाट ही नहीं, नंदुरबार और पालघर जैसे ११ दूसरे आदिवासी इलाकों में भी औरतें और बच्चे कम मेडिकल मदद की वजह से परेशान हैं। १६ जनवरी २०२६ को, पिटीशनर राजेंद्र बर्मा ने राज्य अधिकारियों की लापरवाही दिखाने के लिए एक और एफिडेविट जमा किया। इसे अमरावती के आदिवासी इलाके की हेल्थ सर्विसेज के इतिहास में काला दिन बताते हुए बर्मा ने कहा कि पिछले साल १५ नवंबर को, छह महीने से छह साल की उम्र के चार बच्चों की कुपोषण के कारण २४ घंटे के अंदर जान चली गई। उन्होंने कहा कि उसी दिन, मेलघाट और धरनी में हेल्थ अधिकारियों की लापरवाही के कारण एक जवान मां की मौत हो गई।
सोमवार को सुनवाई के दौरान, पिटीशनर की ओर से पेश जुगलकिशोर गिल्डा ने कहा कि पिछले कुछ सालों में कुपोषण से करीब ३०,००० बच्चों की मौत हो चुकी है। सड़क कनेक्टिविटी की कमी, साफ पीने का पानी, मेलघाट में अनुभवी मेडिकल प्रोफेशनल्स की कमी और मेडिकल रोस्टर में बार-बार बदलाव को रोकी जा सकने वाली मौतों की वजह बताते हुए गिल्डा ने कहा कि राज्य लगातार लापरवाही बरत रहा है। पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट ने कोर्ट को बताया कि मेलघाट में १०५ डॉक्टर तैनात किए गए हैं और कहा कि ऐसी मौतों की मुख्य वजह एनीमिया, बाल विवाह और कम उम्र में प्रेग्नेंसी हैं। कोर्ट ने जवाब दिया कि राज्य को एडमिनिस्ट्रेटिव नाकामी का बहाना बनाए बिना ‘खास इंतजाम और कोशिशें’ करने की जरूरत है।
कोर्ट ने दिए सरकार को निर्देश
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे इलाकों में प्राइमरी हेल्थ सेंटर को डेवलप करने की जरूरत है। सरकार को पिछले कुछ सालों में दिए गए कोर्ट के आदेशों और पालन के लिए उठाए गए कदमों का डिटेल्ड कलेक्शन जमा करने का निर्देश देते हुए बेंच ने अधिकारियों को चार हफ्ते के अंदर एक ‘भविष्य का रोडमैप’ जमा करने का भी निर्देश दिया और साफ किया कि चुनाव आचार संहिता को रुकावट नहीं माना जा सकता। पिटीशनर्स को पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट को सुझाव देने की भी इजाजत दी गई।
