तौसीफ कुरैशी
एक समय था जब टीवी समाचार चैनलों को लोकतंत्र की मजबूत आवाज माना जाता था। उनसे उम्मीद थी कि वे सत्ता से सवाल पूछेंगे, जनता की समस्याओं को सामने लाएंगे और निष्पक्ष पत्रकारिता का उदाहरण बनेंगे। लेकिन समय के साथ अनेक चैनलों ने खबरों से अधिक शोर, तथ्यों से अधिक टकराव और जनसरोकारों से अधिक राजनीतिक बहसों को प्राथमिकता दी। इसका असर दर्शकों के भरोसे पर भी पड़ा।
आज युवा वर्ग विज्ञान, तकनीक, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और नवाचार जैसी उपयोगी जानकारियों की तलाश में डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ रहा है। मोबाइल और सोशल मीडिया ने सूचना को हर व्यक्ति तक पहुंचा दिया है। अब खबर का पहला स्रोत अक्सर कोई आम नागरिक बन जाता है। ऐसे में केवल तेज आवाज या भव्य स्टूडियो दर्शकों को नहीं रोक सकते। हाल के वर्षों में जिन संस्थानों ने तथ्यपरक और संतुलित रिपोर्टिंग की, उन्हें डिजिटल मंचों पर व्यापक पाठक और दर्शक मिले। इससे स्पष्ट है कि लोग आज भी विश्वसनीय पत्रकारिता को महत्व देते हैं। चुनौती सोशल मीडिया नहीं, बल्कि विश्वास का संकट है। यदि समाचार चैनल फिर से जमीनी रिपोर्टिंग, खोजी पत्रकारिता और शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान तथा आम नागरिकों के मुद्दों को केंद्र में रखें, साथ ही सत्ता और विपक्ष, दोनों से समान रूप से जवाबदेही मांगें, तो दर्शकों का भरोसा दोबारा जीता जा सकता है। पत्रकारिता की असली ताकत शोर में नहीं, बल्कि सत्य, संतुलन और जनहित में होती है। आखिरकार, सत्यमेव जयते केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी कसौटी है।
