मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : `कैमरे का झुकाव और लोकतंत्र की छाया’

रुख-ए-सियासत : `कैमरे का झुकाव और लोकतंत्र की छाया’

तौसीफ कुरैशी

चुनावी मौसम में जब भी नरेंद्र मोदी या अमित शाह की रैली शुरू होती है, टीवी स्क्रीन पर जैसे एक अनुष्ठान आरंभ हो जाता है लाइव, लंबा, निर्विघ्न। कैमरे टिके रहते हैं, एंकरों की आवाज नरम पड़ जाती है और समय जैसे ठहर-सा जाता है। एक-डेढ़ घंटे का अखंड प्रसारण, बिना ब्रेक, बिना सवाल।
यह दृश्य अब अपवाद नहीं, प्रवृत्ति बन चुका है। पत्रकारिता का धर्म कभी संतुलन था सत्ता से सवाल, विपक्ष को अवसर और दर्शक को पूरा परिप्रेक्ष्य। लेकिन आज वैâमरा जैसे एक दिशा में झुक गया है। बाकी दलों की सभाएं खबर बनती हैं वह भी छोटी-मोटी कहीं कोने में डालने के लिए, पर प्रसारण नहीं, क्लिप चलती है, पर संवाद नहीं। यही हाल अखबारों का है। सभी का रवैया विपक्ष के प्रति नकारात्मकता से भरा है। यह असमानता सिर्फ समय की नहीं, लोकतांत्रिक स्पेस की भी है। जब एक आवाज लगातार गूंजे और बाकी दब जाएं तो शोर भले बढ़े, बहस घट जाती है। कभी ऐसा होता तो इलेक्शन कमीश्नर ऑफ इंडिया नोटिस लेता, चैनलों को आचार संहिता याद दिलाई जाती। अब सन्नाटा है, जैसे नियम किताबों में रह गए हों और व्यवहार स्टूडियो की रोशनी में तय हो रहा हो। मीडिया, जो जनता की आंख-कान था, वह कहीं-कहीं सत्ता का आईना बन बैठा है चमकदार, मगर एकांगी। भाजपा की चुनावी मशीनरी सशक्त है, इसमें दो राय नहीं। पर पत्रकारिता का काम मशीनरी की ताकत को एम्पिफाइ करना नहीं, उसके असर को समझना और परखना है। अगर कवरेज का पलड़ा एक तरफ झुकेगा, तो लोकतंत्र का तराजू भी डगमगाएगा। दर्शक को विकल्प चाहिए, तुलनात्मक समझ चाहिए ताकि वह तय करे कि किसकी बात में दम है। ‘पत्रकारिता का पहला धर्म है जन के प्रति जवाबदेही लेकिन आज न राज धर्म का पालन है और न ही कोई और धर्म सब गायब है।’ आज सवाल यही है कि वैâमरा किसके प्रति जवाबदेह है? टीआरपी के प्रति, मालिकों के प्रति, या उस नागरिक के प्रति जो रिमोट हाथ में लिए सच की तलाश में बैठा है? समय है कि न्यूजरूम अपने भीतर झांके। लाइव दिखाना बुरा नहीं, एकतरफा दिखाना समस्या है। लोकतंत्र की सेहत वैâमरे के कोण से भी तय होती है। अगर कोण सीधा हो, तो तस्वीर साफ होगी; अगर तिरछा हो, तो सच भी तिरछा दिखेगा।

जनमत की जगह `जन’जाल!
लोकतंत्र में जनमत का अपना एक सलीका होता है। वह चुपचाप बनता है, धीरे-धीरे आकार लेता है और फिर किसी दिन मतदान केंद्र पर जाकर अपना निर्णय दर्ज करता है। लेकिन इन दिनों जो कुछ ‘सर्वे’ के नाम पर परोसा जा रहा है, वह जनमत कम और जनजाल ज्यादा लगता है। विधानसभा चुनाव २०२७ को लेकर एक प्रतिष्ठित अखबार द्वारा कराया गया सर्वे अब सवालों के घेरे में है। वजह अखबार नहीं, बल्कि वे दावेदार हैं जिन्होंने इसे अपनी महत्वाकांक्षा का औजार बना लिया। कहने को यह सर्वे जनता की राय जानने के लिए था, लेकिन हकीकत यह है कि इसे ‘प्रबंधित राय’ में बदल दिया गया। टिकट के आकांक्षियों ने अपने समर्थकों को लिंक भेजे, व्हॉट्सऐप ग्रुप्स में अपीलें कीं और फिर संगठित तरीके से वोटिंग कराई। नतीजा यह हुआ कि जो नाम सामने आए, वे जनसमर्थन के नहीं, बल्कि ‘डिजिटल जुटान’ के प्रतीक बन गए। यह खेल यहीं नहीं रुका। इसके बाद सोशल मीडिया पर उसी अखबार का नाम आगे कर अपनी ‘लोकप्रियता’ के गीत गाए जाने लगे। जैसे कोई जनादेश मिल गया हो। सवाल यह है कि क्या यह सचमुच जनता की आवाज है? या फिर तकनीक के सहारे रचा गया एक भ्रम? पत्रकारिता का काम सत्ता और समाज के बीच सच का सेतु बनना है, न कि किसी के प्रचार का पुल लेकिन आज प्रचार प्रसार कर जनता से लेकर आलाकमान तक को भ्रमित करने का माध्यम बन गया है। यहां दिक्कत यही है कि सर्वे को प्रचार का हथियार बना दिया गया। अखबार की मंशा भले निष्पक्ष रही हो, लेकिन प्रक्रिया की कमजोरियों ने उसकी विश्वसनीयता को चोट पहुंचाई है। सवाल सिर्फ एक सर्वे का नहीं है, बल्कि उस प्रवृत्ति का है जिसमें ‘डेटा’ को भीड़ से नहीं, बल्कि प्रबंधित समूहों से हासिल किया जा रहा है। लोकतंत्र में संख्या का महत्व है, लेकिन वह संख्या तभी सार्थक होती है जब वह स्वतः स्फूर्त हो, न कि निर्देशित। अब जरूरत है कि ऐसे सर्वे की प्रक्रिया पर गंभीरता से पुनर्विचार हो। तकनीकी खामियों को दूर किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी सर्वे ‘प्रायोजित लोकप्रियता’ का मंच न बने। वरना कल को जनमत और जनप्रपंच में फर्क कर पाना मुश्किल हो जाएगा। लोकतंत्र की असली ताकत उसकी सादगी और सच्चाई में है। यदि सर्वे ही उस सच्चाई को धुंधला करने लगें, तो यह चिंता का विषय है और उस पर सवाल उठाना भी लोकतंत्र का ही हिस्सा है।
सत्यमेव जयते…!

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