अनिल मिश्र / पटना
सोशल मीडिया और पोस्टरबाजी के इस दौर में हाल ही में एक पोस्टर ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें लिखा था, “कॉकरोच की तो मांगें मान ली गईं, लेकिन धर्म के नाम पर हो रहे अन्याय पर कौन बोलेगा?” पोस्टर में जेल में बंद मौलाना तौकीर रज़ा की तस्वीर थी। ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा (एआईयूएमएम) की ओर से जारी इस पोस्टर के माध्यम से न्याय की मांग उठाई गई।
लेख में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यह कानून अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव, अत्याचार और हिंसा को रोकने तथा उनके अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है। इसमें अपमानजनक व्यवहार, जबरन मजदूरी, भूमि से बेदखली, मतदान के अधिकार में बाधा, यौन उत्पीड़न और हत्या जैसे अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। साथ ही विशेष अदालतों, पुलिस सुरक्षा, आर्थिक सहायता, रोजगार सुरक्षा तथा शिक्षा एवं प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है।
लेख में यह मांग भी उठाई गई है कि इस कानून के दायरे में मुसलमानों को भी शामिल किया जाए। इसमें कहा गया है कि डॉ. एम. एजाज अली लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं।
लेख के अनुसार, छोटे-छोटे मुद्दों पर त्वरित प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, लेकिन जब समाज और समुदाय से जुड़े बड़े सवाल उठते हैं, तब व्यापक स्तर पर चुप्पी दिखाई देती है।
लेख में दिल्ली में बैठे कुछ मुस्लिम नेताओं की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि केवल बयानबाजी या स्वयं को समुदाय का प्रतिनिधि बताने से बदलाव नहीं आएगा। यदि समाज के अधिकारों की लड़ाई लड़नी है, तो उसके लिए जमीनी स्तर पर संगठित आंदोलन चलाना आवश्यक है।
लेख में कहा गया है कि केवल पोस्टर जारी कर देने या सोशल मीडिया पर अभियान चलाने से न्याय नहीं मिलता। इसके लिए सक्रिय जनआंदोलन, नेतृत्व और संघर्ष की आवश्यकता होती है। अंत में लेखक का मत है कि यदि अन्याय के खिलाफ प्रभावी आवाज उठानी है, तो केवल प्रतीकात्मक विरोध से आगे बढ़कर संगठित और जमीनी स्तर पर प्रयास करने होंगे।
