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बैसाखी महोत्सव में बिखरी संवेदनाओं की रोशनी… ‘कनक दी बल्ली’ ने रिश्तों की सच्चाई से कराया सामना

राजेश सरकार / प्रयागराज

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय एवं चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित बैसाखी महोत्सव के दूसरे दिन मंचित नाटक “कनक दी बल्ली” ने दर्शकों को भावनाओं के समुंदर में डुबो दिया, जहाँ प्रेम, पीड़ा, लालच और सामाजिक विडंबनाएं एक साथ जीवंत हो उठीं।
प्रख्यात नाटककार बलवंत गार्गी की चर्चित कृति का सशक्त निर्देशन रंगकर्मी गुरप्रीत सिंह बैंस ने किया। जबकि इसकी प्रभावशाली संकल्पना एवं डिजाइन सुदेश शर्मा द्वारा तैयार की गई। सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में आयोजित इस प्रस्तुति का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। नाटक की कथा “तारो” नामक युवती के इर्द-गिर्द घूमती है। एक ऐसा जीवन, जिसमें बचपन में ही माता-पिता का साया छिन जाता है और वह लालच व नशे में डूबे मामा के साथ रहने को मजबूर हो जाती है। उसके जीवन में उम्मीद की एक किरण तब आती है, जब वह चूड़ियाँ बेचने वाले युवक “बचना” से प्रेम करने लगती है।
लेकिन समाज की कठोर सच्चाइयां जल्द ही इस प्रेम को चुनौती देती हैं। मासी “ताबा” स्वार्थवश तारो का विवाह एक उम्रदराज, चालाक और बहुविवाही व्यक्ति “मघर” से कर देती है। यह रिश्ता न केवल तारो के सपनों को तोड़ता है, बल्कि उसे एक ऐसे बंधन में बाँध देता है जहाँ उसका अस्तित्व ही संघर्ष बन जाता है। नाटक अपने चरम पर तब पहुंचता है, जब हालात से जूझती तारो, मघर के घर से भागकर बचना के पास पहुंचती है। मगर अतीत की परछाइयां और सामाजिक बंधन उनके मिलन को स्वीकार नहीं होने देते। अंततः मघर और बचना के बीच संघर्ष में बचना की हत्या हो जाती है और इसी के साथ तारो की आखिरी उम्मीद भी दम तोड़ देती है।
यह प्रस्तुति एक गहरी सामाजिक टिप्पणी बनकर उभरती है कि किस तरह नशा, लालच और धन की अंधी दौड़ सच्चे प्रेम और मानवीय रिश्तों को कुचल देती है। मंच सज्जा, प्रकाश व्यवस्था और वस्त्र विन्यास ने नाटक के भावों को और अधिक सजीव बना दिया, वहीं कलाकारों के सशक्त अभिनय ने कथा को आत्मा प्रदान की। “बचना” की भूमिका में रवि चौहान, “तारो” के रूप में लवलीन कौर, “ताबा” के रूप में ईशु बाबर और “निहाली” के रूप में नेहा धीमान ने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। कार्यक्रम के अंत में केंद्र निदेशक द्वारा मुख्य अतिथि को पौधा एवं अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया। ‘कनक दी बल्ली’ सिर्फ एक नाटक नहीं, बल्कि समाज के आईने में झांकने का अवसर बनकर सामने आया जहां हर संवाद, हर दृश्य, दर्शकों को भीतर तक महसूस होता रहा।

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