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महायुति सरकार का चुनावी चूरन… वक्त पर वेतन नहीं पा रहे हैं स्वास्थ्य विभाग के संविदाकर्मी!

-नौटंकी मानी जा रही अविलंब वेतन न देने पर कार्रवाई की चेतावनी

धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई

महाराष्ट्र में निकाय चुनाव नजदीक आ चुके हैं। इस बीच महायुति सरकार ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए स्वास्थ्य विभाग में संविदा पर सेवारत कर्मियों को चुनावी बोल में उतारने के लिए चूरन देने का काम किया है। इसके तहत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने दिखावटी रूप से यह माना कि संविदाकर्मियों को समय पर तनख्वाह नहीं मिल रही है। इसे बारे में शिकायतों का अंबार सरकार की दहलीज तक पहुंच चुका था। इसके बाद हाल ही में जारी सरकारी निर्देशों में वेतन भुगतान में आठ दिनों से अधिक विलंब पर कार्रवाई की चेतावनी देकर सरकार ने प्रशासनिक विफलता की न सिर्फ पुष्टि की है, बल्कि तत्काल सुधार के नाम पर अपने तंत्र को कठघरे में खड़ा भी कर दिया है। इसे केवल नौटंकी के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं अचानक स्वीकारोक्ति विपक्ष को भी अचंभित कर रही है, क्योंकि इसे चुनावी मौसम में भरोसा बहाल करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
हाल ही में जारी परिपत्र के अनुसार, विभागीय योजनाओं के अंतर्गत नियुक्त संविदाकर्मिकों के वेतन और मानधन का भुगतान निर्धारित बजट प्रावधानों से किया जाता है, लेकिन कई स्थानों से समय पर वेतन न मिलने की शिकायतें कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों द्वारा सरकार तक पहुंच रही थीं। इस पृष्ठभूमि में सरकार ने मासिक वेतन वितरण की नियमित समीक्षा और त्वरित निराकरण की बाध्यता तय की है। इसके तहत विभाग ने सभी कार्यक्रम प्रमुखों, सह-संचालकों और उपसंचालकों को प्रत्येक माह अपने अधीनस्थ कार्यालयों की समीक्षा करने और वेतन से संबंधित समस्याओं को प्राथमिकता से सुलझाने का निर्देश दिया है। उपसंचालकों को जिला शल्य चिकित्सक, जिला स्वास्थ्य अधिकारी और चिकित्सा अधीक्षकों से नियमित और संविदाकर्मियों के वेतन और मानधन का विस्तृत विवरण प्राप्त करने के साथ-साथ योजनावार उद्देश्यों के अंतर्गत अपेक्षित व्यय का पखवाड़ा आकलन करने को कहा गया है। मासिक मांग प्रतिवेदन हर माह की एक तारीख तक भेजना अनिवार्य किया गया है।
महज चुनावी पॉलिश बनकर न रह जाए परिपत्र
विपक्ष का कहना है कि चुनावी रैलियों में किए गए दावों का वजन तब ही दिखेगा जब जिला शल्य चिकित्सक से लेकर चिकित्सा अधीक्षकों तक हर कड़ी एक ही महीने में बिना बहाने वेतन खातों तक रकम पहुंचाए, वरना यह परिपत्र महज चुनावी पॉलिश बनकर रह जाएगा। आठ दिन से ऊपर देरी पर कार्रवाई की धमकी अच्छी है, पर असली इम्तिहान पहली तारीख को सैलरी क्रेडिट से होगा। एक भी फाइल अगर पुणे की मेज पर अटकी तो यह स्वीकारोक्ति सरकार के लिए राजनीतिक आत्मघात साबित हो सकती है।

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