सामना संवाददाता / मुंबई
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ की काट खोज पाने में मोदी सरकार नाकाम रही है। इसका सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर पड़ा है। इस कारण डॉलर और रुपए के बीच अंतर बढ़ रहा है। यह साफ है कि मोदी सरकार देश की अर्थव्यवस्था को संभाल पाने में नाकाम हो रही है, जिससे आज डॉलर के मुकाबले रुपया लुढ़ककर ९१ के पार जा चुका है।
बता दें कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। कल मंगलवार को डॉलर के मुकाबले रुपया ९१ के अहम स्तर को पार कर गया। घरेलू करेंसी की शुरुआत २ पैसे की गिरावट के साथ ९०.९३ प्रति डॉलर पर हुई, जबकि सोमवार को यह ९०.९० पर बंद हुई थी।
एशिया की कमजोर मुद्रा…बनता जा रहा है रुपया!
पिछले कुछ महीनों से अमेरिका का श्रम बाजार मजबूत बना हुआ है। इससे डॉलर को समर्थन मिला है। बाजारों को अब उम्मीद है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रख सकता है। देश के भीतर रुपए पर सबसे बड़ा दबाव विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार बिकवाली से आ रहा है। विदेशी निवेशक कई महीनों से भारतीय शेयर बाजार में शुद्ध विक्रेता बने हुए हैं। साल २०२६ में अब तक वे २९,३१५ करोड़ रुपए से ज्यादा के शेयर बेच चुके हैं। इस भारी बिकवाली के चलते रुपया एशिया की प्रमुख मुद्राओं में सबसे कमजोर में से एक बन गया है।
बता दें कि हिंदुस्थानी रुपए पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। इसका परिणाम है कि डॉलर के मुकाबले रुपया तेजी से लुढ़कता जा रहा है। रुपए पर दबाव बढ़ने के बाद कल दिन के कारोबार में यह ९१.०१ प्रति डॉलर के निचले स्तर तक पहुंच गया। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और वैश्विक व्यापार तनाव दोबारा बढ़ने से रुपए पर दबाव बना रहा। रुपया सोमवार को १२ पैसे कमजोर होकर ९०.९० प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, जो अपने अब तक के रिकॉर्ड निचले बंद स्तर के करीब है। इससे पहले १६ दिसंबर २०२५ को रुपया दिन के कारोबार में सबसे निचले स्तर पर पहुंचा था और बंद होते समय ९०.९३ पर रहा था। विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों के मुताबिक, रुपए की मौजूदा कमजोरी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कारणों के ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ का नतीजा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से दोबारा टैरिफ लगाने की धमकी, खासकर ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों से विवाद के कारण, वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने का माहौल बन गया है।
