मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : नादान दोस्त से दाना दुश्मन बेहतर... ऐसे ‘दोस्त’ ही डुबोते...

रुख-ए-सियासत : नादान दोस्त से दाना दुश्मन बेहतर… ऐसे ‘दोस्त’ ही डुबोते हैं नाव!

तौसीफ कुरैशी

राजनीति में विरोधी से ज्यादा खतरनाक कभी-कभी वह दोस्त होता है, जो मदद करने के उत्साह में नाव में छेद करने लगे। समझदार दुश्मन आपके सामने खड़ा होता है, उसका वार दिखाई देता है। नादान दोस्त आपके साथ खड़ा होकर आपकी नींव खोदता है। राजनीति का यह पुराना मुहावरा आज फिर अपनी पूरी प्रासंगिकता के साथ सामने है `नादां दोस्त से दानां दुश्मन अच्छा।’ वकालत के छात्रों का जो असंतोष आज दिखाई दे रहा है, उसकी शुरुआत एक टिप्पणी से हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की कथित ‘कॉकरोच’ वाली टिप्पणी ने छात्रों के भीतर जो सवाल पैदा किए, वे शायद समय के साथ शांत भी हो जाते। आंदोलन आज सड़क पर नहीं है। लेकिन सत्ता के समर्थकों ने जैसे तय कर लिया है कि जो चिंगारी है, उसे बुझाना नहीं, हवा देनी है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की ओर से यह कहना कि आंदोलन करने वाले छात्रों का कहीं रजिस्ट्रेशन नहीं होगा, इसी राजनीति का अगला अध्याय है।

छात्रों को समझाने की जगह डराना, संवाद की जगह धमकी देना क्या यही रास्ता है? इससे आंदोलन समाप्त नहीं होते, पैâलते हैं। कानून पढ़ने वाला विद्यार्थी कल का वकील है। आज वह छात्र है, कल अदालत में संविधान और कानून की भाषा बोलेगा। उसे अगर अभी से यह संदेश दिया जाए कि असहमति की कीमत उसका भविष्य होगा, तो सवाल केवल छात्रों का नहीं रह जाता। सवाल न्याय व्यवस्था की उस बुनियादी आत्मा का हो जाता है, जिसमें असहमति के लिए जगह होनी चाहिए। और फिर वकील कोई कमजोर जमात नहीं हैं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वकीलों ने अदालत से लेकर सड़क तक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई है। पुलिस हो या प्रशासन, सत्ता हो या अदालत जब बार एकजुट होकर खड़ा हुआ है, तो बड़े-बड़े लोगों को पीछे हटना पड़ा है। इसलिए जिन्हें लगता है कि धमकी से छात्र चुप हो जाएंगे, उन्हें इतिहास पढ़ लेना चाहिए। डर से पैदा हुई चुप्पी अक्सर अगले आंदोलन की आवाज बनती है। इधर राजनीतिक मोर्चे पर भी विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है।
अमित शाह से जुड़े सवाल हों या संसद में जवाबदेही का संकट विरोधी अपना काम कर रहा है। उससे राजनीतिक नुकसान हो सकता है, लेकिन असली खतरा कहीं और है। वह नादान समर्थक जो हर सवाल का जवाब गाली में, हर असहमति का जवाब देशद्रोह में और हर आंदोलन का जवाब दमन में खोजता है। किसी छात्र को पाकिस्तानी बता देना आंदोलन का उत्तर नहीं है। संसद बंद करने की सलाह देना लोकतंत्र की रक्षा नहीं, लोकतंत्र से पलायन की सलाह है। मोदी जी, विरोधी को आप दुश्मन मानते हैं, मानिए। लेकिन अपने उन समर्थकों को पहचानिए जो आपकी मदद करने के नाम पर आपकी नाव में छेद कर रहे हैं। सत्ता विरोधियों से नहीं, अपनी गलतियों से कमजोर होती है। और जब गलतियां नादान दोस्त करने लगें, तो पतन की गति और तेज हो जाती है। नाव बचानी है तो नाव में छेद करने वालों को उतारना होगा। वरना डूबने की वजह विरोधी नहीं, अपने ही लोग लिखेंगे।
सत्यमेव जयते..!

अन्य समाचार