अनिल तिवारी
भारतीय चुनावों में लोकतंत्र अब केवल वोट, विकास और विचार तक सीमित नहीं रहा। अब इसमें चेतावनी, चुनौती, वीडियो, पलटवार, पुतला-दहन और अस्पताल-भेंट, सबका समुचित समावेश हो चुका है। यानी लोकतंत्र अब पूर्णत: ‘मल्टीपर्पज इवेंट’ बन चुका है। पश्चिम बंगाल के चुनावी मैदान में उत्तर प्रदेश के तेज-तर्रार आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा बतौर ऑब्जर्वर पहुंचे, तो लगा कि चुनावी आचार संहिता अब सचमुच कड़क चाय की तरह उबलेगी। लेकिन देखते ही देखते मामला प्रशासनिक निरीक्षण से निकलकर संवाद-अभिनय की श्रेणी में चला गया। कथित वीडियो में अधिकारी जी का अंदाज ऐसा था, जैसे चुनावी ड्यूटी नहीं, किसी वेब सीरीज का क्लाइमेक्स सीन चल रहा हो, ‘डराया-धमकाया तो अच्छे से खबर लेंगे।’
अब लोकतंत्र में ‘खबर लेना’ किस धारा के अंतर्गत आता है, यह विधि विशेषज्ञ बताएं, पर चुनावी मैदान में इस वाक्य ने खूब तालियां और उतना ही विवाद बटोर लिया। दूसरी ओर टीएमसी प्रत्याशी जहांगीर खान भी पीछे क्यों रहते? उन्होंने भी फिल्मी अंदाज में एलान कर दिया, ‘खेला उन्होंने शुरू किया है, खत्म हम करेंगे।’ यानी जनता वोट देने जाए या संवादों की पटकथा सुनने, यह संशय पैदा हो गया।
उधर, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस पूरे प्रसंग को उत्तर प्रदेश सरकार की छवि, महिला सम्मान और प्रशासनिक अनुशासन से जोड़ते हुए भाजपा सरकार पर तंज कसा। उन्होंने पूछा कि ऐसे अधिकारी पर कार्रवाई कितनी जल्दी होती है। राजनीति में सवाल पूछना भी कला है, सवाल ऐसा हो कि जवाब आने से पहले ही आरोप अपना काम कर जाए। लेकिन इस कथा का सबसे व्यंग्यपूर्ण अध्याय तब सामने आया, जब अखिलेश यादव उस भाजपा नेता अनुपमा जायसवाल का हालचाल जानने मेदांता पहुंच गए, जो उनका पुतला जलाते समय आग में झुलस गई थीं। राजनीति भी क्या अद्भुत चीज है, पहले पुतला जलाइए, फिर जिसके विरोध में पुतला जला, वही अस्पताल आकर कुशलक्षेम पूछे। यही भारतीय लोकतंत्र का असली ‘हीलिंग टच’ है। कहने को चुनाव जनता का पर्व है, पर दृश्य ऐसा बनता जा रहा है कि कहीं अधिकारी अभिनेता बन जाते हैं, नेता पटकथा लेखक, समर्थक स्टंट कलाकार और जनता दर्शक। कोई ‘खबर लेने’ की बात करता है, कोई ‘खेला खत्म’ करने की, कोई पुतला जलाता है और कोई उसी आग में झुलसे विरोधी का हाल पूछता है। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है, यहां विरोध भी सार्वजनिक होता है, व्यंग्य भी, आग भी और अस्पताल की मुलाकात भी। फर्क सिर्फ इतना है कि जनता हर बार सोचती रह जाती है साहब, हमारी खबर कौन लेगा? और सत्ता किसी की खबर लेने को तैयार नहीं। उसका खबर लेने का अंदाज ही बदल गया है, ईडी-सीबीआई ही अब सबकी खबर लेती हैं।
