सामना संवाददाता / मुंबई
हिंदुस्थान हिटलर जैसा तानाशाह देश नहीं है। अन्याय और अत्याचार को पराजित करना हमारा कर्तव्य है, लेकिन अच्छी बातों को बचाए रखना और बातचीत के दरवाजे खुले रखना हमारी संस्कृति है। यह महत्वपूर्ण बयान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिया है। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले द्वारा पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर दिए गए बयान का समर्थन करते हुए भागवत ने यह विचार व्यक्त किया। वह केरल के तिरुवनंतपुरम में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे।
कुछ महीने पहले संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने कहा था कि हिंदुस्थान को पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए। इस बयान को लेकर विवाद जारी रहने के बीच अब सरसंघचालक ने अपनी भूमिका स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि हम हिटलर जैसे नहीं हैं। यह हमारी प्रवृत्ति नहीं है और न ही हमारा मार्ग है। इसलिए बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। हमें अन्याय और अत्याचार का अंत करना चाहिए, लेकिन जो अच्छा है, उसकी रक्षा भी करनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि आज भी पाकिस्तान में ऐसे बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि हिंदुस्थान का विभाजन गलत हुआ था। वहां एक ऐसा मौन विचार प्रवाह मौजूद है जो पाकिस्तान के द्विराष्ट्र सिद्धांत का विरोध करता है।
मुख्यधारा में शामिल करना होगा
पाकिस्तान में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो मानता है कि साथ रहना अधिक बेहतर था। मोहन भागवत ने कहा कि यदि भविष्य में कभी युद्ध हुआ और हिंदुस्थान ने पाकिस्तान को पूरी तरह पराजित कर दिया, तब भी वहां की जनता को या तो हिंदुस्थान की मुख्यधारा में शामिल करना होगा या फिर उन्हें वहां शांति से जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए। इसके लिए बातचीत के रास्ते खुले रहना आवश्यक है।
होसबले ने कहा था
दत्तात्रेय होसबले ने पिछले महीने एक साक्षात्कार में कहा था कि देश की सुरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करना सरकार का दायित्व है और यह किया ही जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद करने की आवश्यकता नहीं है। संवाद के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए। होसबले के इस बयान का समर्थन भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे ने भी किया था।
