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सस्ती कॉफी के बहाने केबिन कल्चर का फैलता जाल …मुंबई में कैफे के बंद केबिनों में संदिग्ध

सुनील ओसवाल / मुंबई
मुंबई महानगर क्षेत्र में गली-गली में बढ़ते छोटे कॉफी शॉप्स अब सिर्फ कॉफी के लिए नहीं, बल्कि ‘कबिन कल्चर’ को लेकर चर्चा में हैं। मुंबई व आसपास इलाकों सहित उपनगरों में ऐसे वैâफे तेजी से बढ़े हैं, जहां पर्दों और बंद केबिनों के नाम पर संदिग्ध गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों और अभिभावकों का आरोप है कि इन वैâफे में अल्पवयीन लड़के-लड़कियों को बिना किसी जांच के प्रवेश दिया जाता है। ‘प्राइवेसी’ के नाम पर बनाए गए केबिन अब कथित तौर पर अनैतिक गतिविधियों के केंद्र बनते जा रहे हैं। इन वैâफे में कॉफी की कीमत भले ३० से ५० रुपए हो, लेकिन बंद केबिन में बैठने के लिए प्रति घंटा ५०० रुपये या उससे अधिक वसूले जाते हैं। सवाल उठता है कि आखिर यह ‘एकांत’ किसलिए बेचा जा रहा है? कई जगहों पर पहचान पत्र की जांच या एंट्री रजिस्टर तक नहीं रखा जाता, जो नियमों का उल्लंघन है। नियमों के अनुसार अल्पवयीनों को इस तरह की जगहों पर बिना निगरानी प्रवेश देना अपराध है। इसके बावजूद, सैकड़ों वैâफे बिना ठोस पंजीकरण के चल रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन और पुलिस इस पर सख्त कार्रवाई करने से बच रहे हैं। अमरावती के परतवाडा में सामने आए प्रकरण के बाद भी यदि ऐसी व्यवस्थाओं पर लगाम नहीं लगाई गई, तो किसी गंभीर घटना की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावक सतर्क रहें। बच्चों की दिनचर्या, उनके मित्रों और खर्चों पर नजर रखें और किसी भी बदलाव पर संवाद बनाए रखें। नागरिकों की मांग है कि ऐसे वैâफे की नियमित जांच हो, अवैध केबिन और पर्दों पर रोक लगे, और नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए। अब देखना यह है कि प्रशासन इस बढ़ती समस्या पर कब और वैâसे कदम उठाता है।

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