डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी
-अडानी के मुनाफे की भट्टी में भूना जा रहा पूरा देश
पिछले कुछ वर्षों में देश में पर्यावरण को लेकर दो तस्वीरें समानांतर रूप से देखने को मिल रही हैं। पहली तस्वीर में सरकार आम जनता से भावनात्मक अपील करती है— “एक पेड़ मां के नाम” लगाइए। स्कूलों के बच्चे, सरकारी कर्मचारी और पुलिसकर्मी पौधारोपण करते हुए कैमरों के सामने मुस्कुराते नजर आते हैं। दूसरी तस्वीर में उसी सरकार के कार्यकाल में देश के सबसे घने और पुराने जंगल बड़े औद्योगिक समूहों के कोयला खनन प्रोजेक्ट्स के लिए काटे जा रहे हैं।
हसदेव से लेकर गोवा तक: विकास की कीमत कौन चुका रहा है?
छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसे मध्य भारत का “फेफड़ा” कहा जाता है। आदिवासी समुदाय वर्षों से इसे बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन परसा और केते एक्सटेंशन जैसी खदानों के लिए यहां लाखों पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई। इन खदानों का संचालन अडानी समूह द्वारा किया जा रहा है।
केवल हसदेव ही नहीं, बल्कि राजस्थान, ओडिशा और गोवा में भी बंदरगाह, बिजली और खनन परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय मंजूरियां दी गई हैं। कई रिपोर्टों के अनुसार, गोवा में मोपा एयरपोर्ट और उससे जुड़े विकास कार्यों के नाम पर पश्चिमी घाट क्षेत्र में हजारों पेड़ काटे गए। जनता को इसे विकास और रोजगार का मॉडल बताकर प्रस्तुत किया गया।
गर्मी में रिकॉर्ड और शेयर बाजार में उछाल
आज इसके परिणाम सबके सामने हैं। दुनिया के सबसे गर्म शहरों की सूची में भारत के कई शहर शामिल हैं। दिल्ली, प्रयागराज और चूरू जैसे शहर 50 डिग्री सेल्सियस तक की भीषण गर्मी झेल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई, कोयला आधारित ऊर्जा पर निर्भरता और अनियंत्रित शहरीकरण इसके प्रमुख कारण हैं।
विडंबना यह है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, जंगलों की कटाई से कोयला उत्पादन भी बढ़ता है और बड़ी कंपनियों के मुनाफे में इजाफा होता है। जंगल कटने से ऑक्सीजन घटती है और कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, लेकिन शेयर बाजार में संबंधित कंपनियों के शेयर ऊपर जाते दिखाई देते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है मानो नीति का मूल मंत्र यही हो— पेड़ कम होंगे तो धूप सीधे जमीन पर पड़ेगी, फिर सौर ऊर्जा उत्पादन भी बढ़ेगा। कोयला भी निकलेगा और सोलर ऊर्जा का श्रेय भी लिया जाएगा।
विकास के तीन स्तंभ: जनता, उद्योग और सरकार
इस नई विकास परिभाषा के तीन प्रमुख किरदार दिखाई देते हैं—
1. जनता:
45 डिग्री तापमान और बिजली कटौती के बीच सड़क किनारे सूखते पौधों को पानी दे रही है। उसे बताया जा रहा है कि पर्यावरण बचाना केवल उसकी जिम्मेदारी है।
2. उद्योग समूह:
पर्यावरणीय मंजूरी की फाइलों को रिकॉर्ड समय में स्वीकृत कराकर खदान, बंदरगाह और बिजली परियोजनाएं शुरू कर रहे हैं। जंगल उनके लिए प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि संसाधन और मुनाफे का माध्यम बन चुके हैं।
3. सरकार:
भीषण गर्मी को जलवायु परिवर्तन का स्वाभाविक परिणाम बताती है, जबकि वातानुकूलित सम्मेलन कक्षों में बैठकर “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के नए मॉडल तैयार किए जाते हैं, जहां पर्यावरणीय नियमों को अक्सर विकास में बाधा के रूप में देखा जाता है।
सवाल जो पूछे जाने चाहिए
क्या किसी उद्योग समूह के मुनाफे के लिए पूरे देश को भीषण गर्मी की आग में झोंक देना स्वीकार्य है? जब पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टों को कमजोर किया जाता है, जनसुनवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है और जंगल बचाने की लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों पर मुकदमे दर्ज होते हैं, तब पर्यावरण संरक्षण के दावों की वास्तविकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
“एक पेड़ मां के नाम” जैसी पहल सकारात्मक हो सकती है, लेकिन जब तक नीतियों में धरती और जंगलों की वास्तविक कीमत नहीं समझी जाएगी, तब तक जनता द्वारा लगाया गया एक पौधा लाखों कटे हुए पेड़ों की भरपाई नहीं कर पाएगा।
असली पर्यावरणीय प्रेम नारों से नहीं, बल्कि नीयत और नीतियों से दिखाई देता है। अन्यथा आने वाली पीढ़ियां हमसे यही पूछेंगी कि विकास के नाम पर हमने उनकी सांस लेने की हवा तक क्यों बेच दी।
