-कौन बुन रहा दहशत का डिजिटल जाल?
जेदवी / मुंबई
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई एक बार फिर बम धमकियों के साए में आ गई है। दक्षिण मुंबई स्थित किला कोर्ट को गुरुवार को बम से उड़ाने की धमकी मिलने से सुरक्षा एजेंसियों में हड़कंप मच गया। एक अज्ञात व्यक्ति ने ई-मेल भेजकर दावा किया कि अदालत परिसर में विस्फोटक रखा गया है और जल्द ही बड़ा धमाका होने वाला है।
धमकी की सूचना मिलते ही मुंबई पुलिस, बम डिटेक्शन एंड डिस्पोजल स्क्वॉड तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हो गईं। पूरे अदालत परिसर को सुरक्षा घेरे में लेकर घंटों तक सघन तलाशी अभियान चलाया गया। हालांकि, जांच में कोई संदिग्ध वस्तु या विस्फोटक नहीं मिला और धमकी को फर्जी करार दिया गया। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब सरकार और सुरक्षा एजेंसियां चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था के दावे करती हैं, तब आखिर कौन है जो दहशत का यह डिजिटल जाल बुन रहा है? क्या अपराधी इतने बेखौफ हो चुके हैं कि उन्हें सुरक्षा एजेंसियों को बार-बार चुनौती देने का डर नहीं रहा या फिर जांच और साइबर निगरानी तंत्र में ऐसी खामियां हैं, जिनका अपराधी खुलकर फायदा उठा रहे हैं? सबसे बड़ा सवाल यह है कि हजारों फर्जी धमकी भरे ई-मेलों के बावजूद इन घटनाओं पर स्थायी रोक लगाने का कोई ठोस समाधान आखिर कब निकलेगा? किला कोर्ट को मिली धमकी कोई अलग-थलग घटना नहीं है।
२ वर्षों में हजारों फर्जी ई-मेलों ने सुरक्षा एजेंसियों की उड़ाई नींद
पिछले दो वर्षों में मुंबई सहित देशभर के संवेदनशील संस्थानों को हजारों धमकी भरे ई-मेल भेजे जा चुके हैं। अदालतें, मंत्रालय, स्कूल, एयरपोर्ट, शेयर बाजार और सरकारी कार्यालय लगातार निशाने पर हैं। हर बार सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर जाती हैं, व्यापक तलाशी अभियान चलाया जाता है, लेकिन धमकी देने वाले अधिकांश आरोपी लंबे समय तक कानून की गिरफ्त से बाहर बने रहते हैं। यही वजह है कि बार-बार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और साइबर निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
