एजेंसी / नई दिल्ली
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आखिरकार वही किया, जिसे वे अब तक कमजोरी बताकर खारिज करते रहे थे। ईरान को ६० सेकंड की मोहलत तक न देने की बात करने वाले ट्रंप ने अब ६० दिनों की बातचीत का रास्ता खोलने वाले समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसे ट्रंप प्रशासन भले ही शांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रहा हो, लेकिन राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यह युद्ध के मैदान से सम्मानजनक वापसी की कोशिश अधिक दिखाई देती है।
अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से जारी टकराव को खत्म करने के लिए हुए इस एमओयू में तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और अगले ६० दिनों में विस्तृत समझौते पर बातचीत करने की बात शामिल है। मिली जानकारी के अनुसार, यह १४ सूत्री अंतरिम समझौता है, जिसके तहत दोनों पक्षों को अंतिम समझौते की शर्तों पर बातचीत करनी होगी। ट्रंप ने युद्ध के दौरान कई बार बेहद आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया था। उन्होंने ईरान को चेतावनी देते हुए यह संदेश देने की कोशिश की थी कि अमेरिका किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेगा। लेकिन अब वही ट्रंप बातचीत, मध्यस्थता और समयसीमा वाले समझौते की राह पर आ गए हैं। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास है। युद्ध के शुरुआती दिनों में ट्रंप ने इसे निर्णायक संघर्ष की तरह पेश किया था। लेकिन १११ दिन बाद तस्वीर बदल गई। अमेरिका पर सैन्य दबाव बढ़ा, वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को अस्थिर किया और पश्चिम एशिया में अमेरिका की रणनीति उलझती चली गई। ऐसे में एमओयू पर हस्ताक्षर ट्रंप के लिए युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता बन गया। ट्रंप ने भी पहले ईरान को झुकाने की भाषा बोली, लेकिन अंत में उन्हें ६० दिनों की बातचीत की मोहलत देने वाले दस्तावेज पर दस्तखत करने पड़े।
ईरान पर नरमी कतई नहीं
तेहरान ने कदम बढ़ाया तो फिर बरसेंगी मिसाइलें!’
मध्य-पूर्व में तनाव कम करने की कोशिशों के बीच इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के दबाव में नहीं आएगा। भारत में इजरायल के राजदूत रुविन अजार ने कहा है कि यदि ईरान ने परमाणु हथियार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया तो इजरायल कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने दो टूक कहा कि इजरायल एक संप्रभु राष्ट्र है और अपनी सुरक्षा को लेकर किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं करेगा।
जंग-जंग चिल्लाने वाला अमेरिका कैसे पड़ा नरम?
कल तक ईरान के खिलाफ जंग का बिगुल फूंकने वाला अमेरिका अचानक नरम क्यों पड़ गया? जो वॉशिंगटन कुछ दिन पहले तक धमकियों, प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाई की भाषा बोल रहा था, वही अब बातचीत और समझौते की मेज पर क्यों दिखाई दे रहा है? सवाल सिर्फ अमेरिका के बदले हुए तेवरों का नहीं, बल्कि उस रणनीति का भी है जिसने दुनिया को एक और बड़े युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था।
