दो कौड़ी के लोग

रील-शोहरत का लगा अब तो ऐसा रोग,
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

लाइक-शेयर की भूख में बेच रहे संस्कार,
प्रसिद्धि की चाह ने तोड़े सब व्यवहार।
पाने सस्ती तालियाँ, करते गलत प्रयोग—
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

ज्ञान नहीं, बस शोर है, दिखता चारों ओर,
भीतर खालीपन लिए, बाहर मचता शोर।
सच की कीमत घट गई, झूठ हुआ उद्योग—
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

कपड़ों से पहचान का करने लगे बयान,
चरित्रों की धूल पर लिखते झूठा मान।
नंगेपन तक आ गए, ये कैसा दुर्योग—
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

‘सौरभ’, ये कैसा समय, कैसा यह बदलाव,
मर्यादा की शाख पर सूख गया अब छाँव।
लाइक-शेयर में ढूँढते जीवन का संयोग—
लाज-शरम सब बेचते, वाह-वाह के लोग।।

-डॉ. प्रियंका सौरभ

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