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अंडरवर्ल्ड सीक्रेट :  उसका कॉल ट्रेस हुआ और…

सूरज सिंह

मुंबई वह शहर है, जो दिन में सपने दिखाता है और रातभर जागता है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में इसी शहर का चेहरा अंडरवर्ल्ड की वजह से तेजी से बदलने लगा। एक ओर देश औद्योगिकरण और आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ रहा था, वहीं दूसरी ओर मुंबई में अपराध जगत अपनी समानांतर सत्ता स्थापित कर रहा था। चॉलों, मिलों, डॉक क्षेत्रों और बंदरगाहों के बीच शक्ति-संतुलन की एक जटिल व्यवस्था बन चुकी थी।
अंडरवर्ल्ड का विभाजन और शक्ति-संतुलन
सत्तर के दशक के अंत से लेकर नब्बे के दशक के मध्य तक, मुंबई का अंडरवर्ल्ड कई धड़ों में विभाजित था। हर धड़े की अपनी नीतियां, अपना इलाका और अपनी वजहें थीं।
दगडी चाल और मजदूरी बेल्ट
दगडी चाल और उससे सटे इलाकों पर उस समय अरुण गवली का गहरा प्रभाव था। मिलों, चॉलों और मजदूर वर्ग में उसका मजबूत नेटवर्क था। यही वह क्षेत्र था जहां बाबू रेशीम और रमा नाईक जैसे नाम भी सक्रिय थे।
छोटा राजन गुट और गुरु साटम
दूसरी दिशा में छोटा राजन का नेटवर्क तेजी से बढ़ रहा था। इसी गुट के प्रमुख चेहरों में गुरु साटम था जिसने दादर, परेल, शिवड़ी सहित विस्तृत क्षेत्रों में अपनी पकड़ विकसित की।
नागपाड़ा-डोंगरी-भिंडी बाजार बेल्ट
यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से अपराध, तस्करी और गैंगवार का केंद्र रहा। यहां दाऊद इब्राहिम और पठान गिरोह आमने-सामने थे। बंदरगाहों, हवाला और विदेशी नेटवर्क से जुड़ाव के कारण यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। इन तीनों शक्ति-प्रवाहों के बीच शहर धीरे-धीरे पिसने लगा- मिल मजदूर, बंदरगाह, राजनीति, पुलिस और अपराध जगत सभी एक-दूसरे से टकरा रहे थे।
शिवड़ी-परेल की गलियों से उठा एक नाम सुरेश उर्फ सूर्या भाई इन्हीं उथल-पुथल वाले दिनों में शिवड़ी और परेल के बीच बसे मजदूर इलाकों में बड़ा हो रहा था। स्थान था- महार्षि दयानंद कॉलेज के पीछे की तंग गलियां, जहां झोपड़ियां सटी हुई थीं। उस लड़के का नाम था- सुरेश पिता मिल में थे। घर चलता था, पर भविष्य धुंधला था। सुरेश मनपा स्कूल में पढ़ा, पर छठी तक आते-आते पढ़ाई छोड़ दी। मिल क्षेत्रों और सड़क-राजनीति से भरी इन गलियों में युवाओं का अपराध की ओर झुकना आसान था। सुरेश भी धीरे-धीरे स्थानीय गुंडों और गली-स्तर के विवादों से जुड़ने लगा। उसी समय शिवड़ी में एक नामचीन नाम था जनार्दन भैया, सुरेश उसी के सानिध्य में रहने लगा। कुछ समय बाद यानी १९८८ यही वह समय था जब सुरेश का सामना अंडरवर्ल्ड के असली नामों से हुआ। कौन किसका आदमी है, किसका इलाका कहां है, कौन किससे भिड़ता है, इत्यादि। साल १९८२, जब मिलें बंद हो रही थीं और मजदूर असंतोषित थे, उसी समय शिवड़ी-परेल में जनार्दन भैया उर्फ जना भाऊ का नाम चमक रहा था। सुरेश ने जना भाऊ का चेला बनकर शुरुआत की। धीरे-धीरे उसका प्रभुत्व बढ़ा और उसका नाम काला चौकी, परेल, शिवड़ी, रे रोड, डोंगरी सहित कई इलाकों में सुनाई देने लगा। उसकी गतिविधियां थीं वसूली, धमकी, विवाद निपटाना, कट्टा लेन-देन।
२१ वर्ष तक पुलिस को चकमा
कहा जाता है कि सुरेश मंचेकर ने लगभग २१ वर्षों तक मुंबई पुलिस को छकाए रखा। इसी दौरान मुंबई में अंडरवर्ल्ड का बड़ा परिवर्तन हुआ। दाऊद विदेश भाग गया, छोटा राजन उससे अलग हो गया, अरुण गवली जेल आया-गया, पठान गिरोह कमजोर पड़ा। निर्माण और एसआरए माफिया उभरे।
पुलिस एनकाउंटर स्पेशलिस्टों का दौर शुरू हुआ। दिलचस्प तथ्य यह कि सुरेश ने ‘मुंबई से अधिक नाम ठाणे, कल्याण, डोंबिवली में कमाया।
९० के दशक में इन क्षेत्रों में जमीन, निर्माण, वसूली और विवाद का बड़ा खेल चल रहा था, जिसमें सुरेश का नेटवर्क सक्रिय था। इस नेटवर्क को खत्म करने के लिए मुंबई पुलिस ने टीम बनाई थीं यहां तक कि मुंबई पुलिस के उस समय के आयुक्त एस चक्रवर्ती ने सुरेश मंचेकर को पुलिस का मोस्ट वांटेड घोषित किया।
सुरेश का पीछा और अंत
मुंबई पुलिस के जाबांज अधिकारी रविन्द्र आंगरे की टीम ने सुरेश का लगभग ५०० दिन तक पीछा किया। इस दौरान मंचेकर कोल्हापुर में छुपा हुआ था, किसी से बात करना होता तो वह एक सिम कार्ड मात्र ३ बार इस्तेमाल करता, यही नहीं कोल्हापुर से वह गोवा जाता वहां से कॉल कर वह सिम कार्ड फेंक दिया करता था। इतना ही नहीं पीसीओ बूथ से लगभग ३५० फोन कॉल जैसी रणनीतियां अपनाता था। आखिरकार एक कॉल ट्रेस हो गया। कोल्हापुर रेलवे स्टेशन के पास पुलिस ने उसका सामना किया और मुठभेड़ में वह मारा गया।
आतंक के एक अध्याय का अंत
१५ अगस्त २००३ को ठाणे, कल्याण और डोंबिवली कुख्यात गैंगस्टर सुरेश के आतंक से आजाद हुए। समापन इतिहास की दीवार पर काली स्याही। मुंबई का यह दौर अब इतिहास है, मगर इसकी छाप आज भी जीवित है। यह वह समय था जब एक ही शहर मिल मजदूरों की चीखें सुनता था, बंदरगाहों से हवाला राशि निकलती थी, राजनीति और माफिया हाथ मिलाते थे। पुलिस की ‘क्लीन-अप’ टीम सक्रिय थीं, और एक झोपड़ी में जन्मा लड़का गलत दिशा में जाते हुए, २१ वर्षों तक पुलिस और समाज दोनों को चुनौती देता रहा। उस लड़के का नाम था- सुरेश मंचेकर

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