मुख्यपृष्ठस्तंभइस सरफिरे का क्या किया जाए! 

इस सरफिरे का क्या किया जाए! 

-पहले कहा था ४-५ हफ्ते, छह महीने बाद भी युद्ध जारी; अब ट्रंप फिर बोले-‘बहुत ज्यादा लंबा नहीं चलेगा’

कभी चार-पांच हफ्ते, कभी ‘जल्द खत्म’, कभी ‘हम जब चाहेंगे तब खत्म’ और अब फिर दावा कि ईरान के साथ युद्ध बहुत ज्यादा लंबा नहीं चलेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बदलते बयानों ने सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इस युद्ध की कोई निश्चित रणनीति है भी या दुनिया को हर कुछ हफ्तों में एक नया भरोसा दिया जा रहा है?
अमेरिका ने २८ फरवरी २०२६ को ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत की थी। उसके अगले ही दिन ट्रंप ने संकेत दिया था कि लड़ाई चार से पांच सप्ताह तक चल सकती है। लेकिन देखते-देखते छह महीने बीत गए और युद्ध खत्म होने के बजाय खाड़ी क्षेत्र को लगातार अस्थिर करता रहा।
अब २ सितंबर को ट्रंप ने फिर कहा कि उन्हें नहीं लगता कि युद्ध ‘बहुत ज्यादा लंबा’ चलेगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने ईरान की रडार और मिसाइल सुविधाओं पर नए हमले किए हैं और दोनों ओर से जुलाई के बाद सबसे तीखा सैन्य टकराव देखने को मिला है।
यही ट्रंप अगस्त में भी कह चुके थे कि युद्ध ‘बहुत जल्द’ खत्म हो सकता है। लेकिन जमीनी हकीकत उनके दावों से मेल नहीं खा रही। छह महीने के संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को तनाव का केंद्र बना दिया है, तेल बाजार को झटके दिए हैं और अमेरिकी हथियार भंडार पर भी दबाव बढ़ाया है।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि युद्ध कब खत्म होगा। बड़ा सवाल यह है कि जिस राष्ट्रपति के हर नए बयान के साथ युद्ध खत्म होने की तारीख आगे खिसकती रहे, उसकी अगली घोषणा पर दुनिया भरोसा आखिर क्यों करे।
जंग का बिल कई साल चुकाएगी दुनिया!
इस संकट का असर युद्ध खत्म होते ही गायब नहीं होगा। लंबे समय तक महंगी ऊर्जा ने उत्पादन और माल ढुलाई की लागत बढ़ाई है। कंपनियां बढ़ा खर्च उपभोक्ताओं पर डालेंगी, जिससे खाद्य सामग्री, यात्रा और रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक के नीति-निर्माताओं ने भी चेताया है कि ईरान युद्ध महंगाई को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है। दूसरा बड़ा झटका ब्याज दरों का है। ऊर्जा महंगाई बढ़ी तो केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल होगा। वैश्विक बॉन्ड बाजार पहले ही दबाव में हैं और उधारी की लागत बढ़ रही है। इसका असर सरकारों, उद्योगों और मकान-कार ऋण लेने वाले आम लोगों तक पहुंचेगा।

सबसे गंभीर नुकसान भरोसे का है। जहाजरानी कंपनियां अब खाड़ी मार्ग को अधिक जोखिम वाला मानेंगी, बीमा महंगा रहेगा और देश वैकल्पिक ऊर्जा तथा आपूर्ति मार्गों पर अरबों डॉलर खर्च करेंगे। यानी ट्रंप की मिसाइलें भले आज दागी जा रही हों, लेकिन उनका आर्थिक मलबा अगले तीन-चार वर्षों तक दुनिया की जेब से उठाया जा सकता है।
भारत की जेब पर चोट
ईरान युद्ध की सबसे भारी आर्थिक मार झेलने वाले देशों में भारत भी है। वजह साफ है, भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में है। जैसे ही खाड़ी में तनाव बढ़ता है और ब्रेंट क्रूड महंगा होता है, भारत का आयात बिल बढ़ने लगता है। हालिया तनाव के बीच ब्रेंट करीब ९७ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है।
पहली चोट, पेट्रोल-डीजल और महंगाई: कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहा तो सरकार और तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा। र्इंधन महंगा होने का असर ट्रक भाड़े से लेकर सब्जी, दूध, सीमेंट और हवाई किराए तक पहुंचता है।
दूसरी चोट, रुपए पर दबाव: तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर चाहिए। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर हो सकता है। फिलहाल आरबीआई डॉलर बेचकर रुपए को संभाल रहा है, लेकिन युद्ध लंबा चला तो दबाव बना रहेगा।
तीसरी चोट, एलएनजी भी महंगी: खाड़ी से गैस आपूर्ति बाधित होने के कारण एशियाई स्पॉट एलएनजी की कीमत युद्ध से पहले के मुकाबले दोगुने से अधिक हो चुकी है। भारत तक पहुंचने वाले कुछ कार्गो को होर्मुज के बाहर दूसरे जहाजों में ट्रांसफर करना पड़ा। इसका असर बिजली, खाद और उद्योग की लागत पर पड़ सकता है।
चौथी चोट, विकास पर ब्रेक: महंगा तेल, कमजोर रुपया और ऊंची महंगाई मिलकर ब्याज दरों में राहत को टाल सकते हैं। कंपनियों की लागत बढ़ेगी, निवेश धीमा पड़ सकता है और सरकार का सब्सिडी बोझ बढ़ सकता है।
यानी युद्ध हजारों किलोमीटर दूर है, लेकिन उसकी आग भारत के पेट्रोल पंप, रसोई, बिजली बिल और ईएमआई तक पहुंच सकती है।

 

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