रूख-ए- सियासत / तौसाफ कुरैशी
दो महिला पत्रकारों की पुलिसिया पिटाई का जवाब दिल्ली पुलिस को देना होगा। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पत्रकारों पर हाथ क्यों उठाया गया, सवाल यह है कि हाथ उठाने वाली पुलिस को जवाबदेह कौन बनाएगा? वही दिल्ली पुलिस, जो सत्ता के गलियारों में इतनी चौकन्नी रहती है कि ऊपर से इशारा मिलने में उसे देर नहीं लगती। लेकिन जब सवाल जनता या पत्रकारों की सुरक्षा का हो तो अचानक आदेश ऊपर से आने लगते हैं। पूर्व नौकरशाह आशीष जोशी को पार्क से उठाए जाने की खबर और घंटों पूछताछ के बाद भी एफआईआर की प्रति न मिलने का सवाल भी इसी अंधेरे में खड़ा है। अगर पुलिस किसी को यह कहकर ले जाए कि ‘कुछ मिनट बात करनी है’ और फिर घंटों कहती रहे कि ‘ऊपर से छोड़ने के आदेश नहीं हैं’, तो लोकतंत्र का सामान्य नागरिक स्वाभाविक रूप से पूछेगा ये ऊपर आखिर है कहां? पुलिस कमिश्नर के ऊपर या गृह मंत्री के ऊपर? और अगर आदेश पुलिस कमिश्नर के नहीं थे तो फिर कमिश्नर किसके आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे?
और यदि आदेश गृह मंत्री के थे तो क्या पुलिस की स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ पुलिस की वर्दी तक रह गया है? यही सवाल तब और बड़ा हो जाता है जब किसी की एफआईआर लिखवाने के लिए राहुल गांधी को कथित तौर पर घंटों थाने में बैठना पड़े। आखिर वह कौन-सा अदृश्य ‘ऊपर’ है, जिसके आदेश के बिना थाने में कलम नहीं चलती?
कानून की किताब में तो थानेदार होता है, लेकिन व्यवहार में लगता है कि थानेदार से ऊपर कोई ऐसा अदृश्य अधिकारी बैठा है जिसका नाम सरकारी कागजों में नहीं मिलता। लोकतंत्र की विड़बना देखिए एक तरफ अदालतें जांच एजेंसियों को पुलिस की जांच सौंपने की बात करती हैं और दूसरी तरफ आम आदमी यह समझने में लगा है कि पुलिस किसकी सुनती है। विपक्ष भी कमाल का है। सत्ता से सवाल पूछने का मौसम चुनाव के साथ क्यों आता है? २०२७ का इंतजार है या २०२९ का? क्या लोकतंत्र की रक्षा की तारीख चुनाव आयोग तय करेगा? अगर आज आवाज दब रही है तो विपक्ष कल किस आवाज से बोलेगा? आज पत्रकार के हाथ में कम से कम माइक है। कल अगर माइक भी छीन लिया गया तो विपक्ष जनता तक अपनी बात किस रास्ते से पहुंचाएगा? यही सबसे भयावह सवाल है। जब सत्ता से असहमति अपराध जैसी लगे, पत्रकार सवाल पूछने से डरें और विपक्ष जवाबदेही के लिए चुनावी वैâलेंडर देखे, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे मरता नहीं वह चुप कराया जाता है। बचा-खुचा आजाद प्रेस आज मदद मांग रहा है। वह उन रहनुमाओं को खोज रहा है जो कभी इंसान थे, जनता के बीच थे, सवालों के साथ खड़े थे और अब सत्ता की ऊंचाइयों पर पहुंचकर खुद को खुदा समझने लगे हैं। लेकिन याद रहे माइक छीन लेने से सवाल मरते नहीं। वे बस जनता के भीतर चले जाते हैं। और जब भीतर जमा सवाल बाहर आते हैं, तब किसी ‘ऊपर’ से उन्हें रोकने का आदेश नहीं आता। सत्यमेव जयते..!
