हिमांशु राज
चार जुलाई 1775 को नवाब आसफ-उद-दौला से संधि होने पर बनारस के राजा चेत सिंह को जमींदार का तमगा मिला। इसके बदले बनारस राज्य ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खजाने में हर साल 23 लाख 40 हजार 249 रुपये मासिक किश्तों में जमा करने का वादा किया। सबकुछ ठीक चल रहा था, मगर जुलाई 1778 में फ्रांस-इंग्लैंड युद्ध फूट पड़ा। इसी मौके का फायदा उठाकर कंपनी ने राजा पर अतिरिक्त पैसे वसूलने का जोर डालना शुरू कर दिया। चेत सिंह ने एक-दो बार तो मांग पूरी की, लेकिन बाद में साफ मना कर दिया।
घटना को सुलझाने गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स 7 जुलाई 1781 को कलकत्ता (अब कोलकाता) से जहाज पर सवार होकर बनारस रवाना हुए। वे कबीर चौरा के माधवराव बाग (आज का स्वामीबाग) में ठहरे। वहां से उन्होंने रेजीडेंट मार्कहम को फरमान जारी किया कि 16 अगस्त 1781 को शिवाला किले (राजा का शहर महल) पहुंचकर चेत सिंह को कैद कर लो। यह खबर बनारस की गलियों में आग की तरह फैल गई। रात के अंधेरे में ही लाठियां, तलवारें थामे शहरवासी और राजा के सिपाही शिवाला की ओर उमड़ पड़े।
शिवाला किले में खूनी रात का तांडव
सुबह होते ही मेजर फोफम के साथ मार्कहम की टुकड़ियां किले पर चढ़ आईं। लेकिन वहां देसी हथियारों से लैस हजारों बनारसवासी और राजा के योद्धा उन्हें घेर चुके थे। कंपनी का सूबेदार केतराम गवर्नर का कठोर संदेश लेकर राजा के पास पहुंचा। जैसे ही उसने अपमानजनक लहजे में बात कही, बनारस की तलवारें चमक उठीं। केतराम का सिर धड़ से अलग हो गया और खून से सना आंगन में लोटने लगा।
बाबू मनियार सिंह व बाबू नन्हकू सिंह ने लेफ्टिनेंट स्टाकर व साइम्स को गिरफ्तारी के इरादे से आगे बढ़ते देख तलवारें भांजी। दोनों ब्रिटिश अफसर तुरंत ढेर हो गए। बाहर हंगामा मच गया। बनारसियों और राजसैनिकों ने पलभर में कंपनी के 200 से ज्यादा सिपाहियों को तलवारों की धार पर लिटा दिया। इसी फुर्सत में लोगों ने पगड़ियां बांधकर रस्सी तैयार की। राजा चेत सिंह को किले के पिछले हिस्से से गंगा घाट पर उतारा गया। इंतजार कर रही नावों ने पाल खोले और बिजली की चमक की तरह राजा को गंगा पार रामनगर किले तक सुरक्षित पहुंचा दिया।इस काशी विद्रोह की चिंगारी ने कंपनी के दिल्ली दरबार से लंदन तक हड़कंप मचा दिया। वारेन हेस्टिंग्स को चापलूसों की मदद से 31 अगस्त की रात महिलाओं के जोड़े में छिपकर चुनार की ओर भागना पड़ा। सुबह होते ही उनकी इस भगदड़ की कहानी शहर के हर चौराहे, चट्टी पर गूंजने लगी। काशी फिर से अपनी बेफिक्री में डूब गई। मोहल्ले-गलियां शाम तक ‘हर हर महादेव’ के उद्घोषों से झूम उठीं। नौजवान, किशोर और बच्चे उत्सव के रंग में “घोड़े पर हौदा और हाथी पर जीन, भागा रे भागा वारेन हेस्टीन’’ जैसे छेड़छाड़ भरे गीत गाते शहर भर में मस्ती के धमाल मचा रहे थे।
शिवाला की कब्रें : वीरता की अमिट निशानी
आज भी शिवाला का वह कब्रिस्तान इतिहास की सिसकारियां समेटे खड़ा है। पुरानी शिलास्लाबी चुपचाप बयान करती है उस खूनी जंग की, जहां ड्यूटी पर लेफ्टिनेंट स्टाकर, स्टाक और जार्ज समेत करीब दो सौ ब्रिटिश सैनिकों की सांसें थम गईं। वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु राज के अनुसार, पुरातत्व विभाग की साइट पर शिवाला के ‘यूरोपीय अफसरों की समाधियां’ को ऐतिहासिक धरोहर नंबर 100 मान्यता दी गई है। ये निशानियां काशीवासियों की बेमिसाल बहादुरी का जीवंत साक्ष्य हैं। पूरा इलाका इतिहास की किताब सरीखा है—यहीं तो 240 साल पहले अंग्रेजों के खिलाफ पहला चिंगारी भरा बगावत का बीज बोया गया था। दफन इन कब्रों में ही उस क्रांति की पूरी कहानी समाई हुई है। बोर्ड पर साफ लिखा है कि यह स्मारक प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत राष्ट्रीय महत्व का है। क्षति पहुंचाने पर एक लाख का जुर्माना और दंड। विभाग के लोग कभी-कभार आते हैं, पर नियमित कर्मचारी लंबे अरसे से गायब। कुछ दशक पहले तक तीन कब्रें दिखती थीं, अब बस एक बची, घास-झाड़ी से ढकी। सरकारी संरक्षण की मांग की गूँज़ यदा कदा उठती रहती है इस ऐतिहासिक साक्ष्य की।
