रामदिनेश यादव
कभी शिक्षा, संस्कृति, विचार और सामाजिक जागरूकता की पहचान रहा पुणे आज एक अलग वजह से सुर्खियों में है। जिस शहर को ‘पूर्व का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाता था, जहां देशभर से लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए आते हैं, वही पुणे अब बढ़ती आपराधिक घटनाओं, नशाखोरी, गैंगवॉर, हत्या, अपहरण और सड़क गुंडागर्दी के कारण चर्चा में है। सवाल यह है कि आखिर पुणे को किसकी नजर लग गई?
पुणे केवल एक शहर नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की बौद्धिक और सांस्कृतिक राजधानी माना जाता रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज के काल से लेकर आधुनिक भारत तक इस क्षेत्र ने विद्वानों, समाज सुधारकों, शिक्षाविदों और राष्ट्रनिर्माताओं को जन्म दिया। महात्मा ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, गोपालकृष्ण गोखने और बाल गंगधार तिलक जैसी विभूतियों की कर्मभूमि रहे पुणे ने देश को शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन की दिशा दी।
आज भी पुणे में देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, इंजीनियिंरग कॉलेज, प्रबंधन संस्थान और अनुसंधान केंद्र हैं। लाखों छात्र यहां अपने सपनों को साकार करने आते हैं, लेकिन इसी शहर की पहचान पर अब अपराध का साया गहराता दिखाई दे रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में पुणे में हत्या, अपहरण, मादक पदार्थों की तस्करी, शराब के नशे में वाहन चलाने, गैंगवॉर, रंगदारी और संगठित अपराध की घटनाओं में वृद्धि ने नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है। कई मामलों में अपराधियों में कानून का भय समाप्त होता दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर हथियारों का प्रदर्शन, सड़कों पर खुलेआम गुंडागर्दी और युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति ने शहर की छवि को गहरा आघात पहुंचाया है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि शिक्षा के लिए प्रसिद्ध शहर अपराध की खबरों में क्यों छाने लगा है? विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित शहरीकरण, जनसंख्या में तेज वृद्धि, बाहरी तत्वों की बढ़ती घुसपैठ, नशे के कारोबार का विस्तार और कानून-व्यवस्था पर बढ़ता दबाव इसके प्रमुख कारण हैं।
आईटी हब और औद्योगिक केंद्र बनने के साथ पुणे का तेजी से विस्तार हुआ, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था उसी गति से मजबूत नहीं हो सकी।
विपक्षी दल राज्य सरकार पर कानून-व्यवस्था संभालने में विफल रहने का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि अपराधियों में पुलिस और कानून का भय होता तो पुणे जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण शहर में अपराध का ग्राफ इस तरह नहीं बढ़ता। सरकार के लिए यह केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है, क्योंकि महाराष्ट्र का सबसे शिक्षित और आधुनिक शहर नकारात्मक कारणों से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ रहा है।
हालांकि, यह भी सच है कि पुणे की पहचान केवल अपराध नहीं है। आज भी यह शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग, आईटी और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। लेकिन यदि अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले वर्षों में शहर की मूल पहचान को गंभीर क्षति पहुंच सकती है।
पुणे को फिर से ‘विद्या की नगरी’ बनाना केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए सरकार, कानून-व्यवस्था तंत्र, शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों को मिलकर काम करना होगा। अन्यथा जिस शहर पर कभी पूरे देश को गर्व था, वह अपराध और अराजकता के प्रतीक के रूप में पहचाना जाने लगेगा।
पुणे की साख बचाना आज केवल एक शहर का नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को बचाने का प्रश्न बन चुका है।
