– ३ महीने की प्रतीक्षा के बाद ईडी विस्तार पर मुहर
-देशभर में यूनिट्स बढ़ेंगी
– नोएडा, पुणे, बंगलुरु जैसे शहरों में बढ़ेगा दायरा
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
तीन महीने की प्रतीक्षा के बाद प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के वैâडर विस्तार का रास्ता साफ होने की खबर ने राजनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है। प्रस्तावित विस्तार के तहत देशभर में ईडी की यूनिट्स बढ़ाई जाएंगी, कई सब-जोन को जोन में बदला जाएगा और नोएडा, पुणे, बंगलुरु, हैदराबाद जैसे बड़े आर्थिक केंद्रों में एजेंसी की मौजूदगी और मजबूत होगी।
ईडी की मौजूदा संगठनात्मक संरचना में पहले से कई जोन और सब-जोन काम कर रहे हैं, जिनमें दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलुरु, लखनऊ, पटना, अमदाबाद, भुवनेश्वर, गुवाहाटी आदि शामिल हैं। सरकार का तर्क होगा कि आर्थिक अपराध, धनशोधन, हवाला, शेल कंपनियों और साइबर-फाइनेंशियल अपराधों के बढ़ते मामलों को देखते हुए ईडी का विस्तार जरूरी है। बड़े शहरों में रियल एस्टेट, स्टार्टअप, टेक कंपनियां, विदेशी निवेश, चुनावी चंदा और कॉरपोरेट लेन-देन की जटिलता बढ़ी है। ऐसे में जांच एजेंसी को अधिक अधिकारी, अधिक कार्यालय और अधिक तकनीकी संसाधन देने की प्रशासनिक जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन असली सवाल यह है कि यह विस्तार केवल आर्थिक अपराधों पर चोट करेगा या राजनीतिक विरोधियों की गर्दन तक पहुंचने का नया औजार बनेगा?
सत्ता के करीबियों पर ईडी की चुप्पी
ईडी की शक्ति बढ़े, इसमें समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब जांच की धार चयनित दिखाई देने लगती है। यदि एजेंसी सभी दलों, सभी सरकारों, सभी बड़े कारोबारियों और सत्ता से जुड़े लोगों पर समान कठोरता से कार्रवाई करे, तो उसका विस्तार लोकतंत्र के लिए उपयोगी माना जाएगा। लेकिन यदि विस्तार का अर्थ केवल विपक्ष के दरवाजे तक दस्तक और सत्ता के करीबियों पर चुप्पी है, तो यह लोकतांत्रिक संतुलन के लिए चिंता का विषय बनेगा। ईडी अब बड़ी टीम के साथ काम करेगी। इसका सीधा अर्थ है कि जांच तेज होगी, छापे बढ़ेंगे, समन अधिक जारी होंगे और राज्यों में एजेंसी की पहुंच गहरी होगी। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विस्तार आर्थिक अपराधों के खिलाफ राष्ट्रीय कार्रवाई बनता है।
पिछले कुछ वर्षों में ईडी की कार्रवाई विपक्षी नेताओं, राज्य सरकारों से जुड़े मंत्रियों, कारोबारियों और राजनीतिक सहयोगियों तक लगातार पहुंची है। यही कारण है कि वैâडर विस्तार की खबर को विपक्ष जांच क्षमता बढ़ाने से ज्यादा राजनीतिक दबाव बढ़ाने की तैयारी के रूप में देखेगा।
