बंद आँखों के अँधेरे में
कभी-कभी ओचक उजाला
दीख पड़ता है।
उसी आलोक में एक चेहरा
मूर्तिमान हो जाता है।
लाख प्रयत्न करती हूँ
उसे पहचान कर
एक प्यारा-सा नाम दूँ।
कौन दिखता है,
नहीं कह सकती।
फँसी हुई हूँ इसी भ्रमजाल में।
एक झलक मात्र दिखी थी तुम्हारी,
तुम्हारी आवाज़ में कहीं खो गई थी।
खुली आँखों में छाए अँधेरे में
अपनी ही पहचान खो जाती है।
अँधेरे-उजाले के झमेले में बस
हर महक पहचान लेती हूँ।
तुमने पूछा था—
“किस गुलाब की महक
सबसे अच्छी लगती है?
सुर्ख लाल या गुलाबी गुलाब की?”
“पीले गुलाब की,”
मैंने ऊँची आवाज़ में कहा था।
स्तब्ध रह गए थे तुम।
एक अर्से बाद, फिर भीड़ में ही
आमना-सामना हुआ।
“क्या अब भी पीले गुलाब की
महक याद है?”
हाँ,
तुम्हें भर आँख नहीं देख पाई थी।
पीले गुलाब की एक कलम रोप दी थी
तुम्हारे नाम की।
आज मेरे कमरे के गवाक्ष से
झाँकती हैं कुछ पीली कलियाँ।
महकाती हैं मेरे तन और मन को।
समा गई है यही महक मेरे आस-पास।
कैसे भुला दूँ
तेरी क्षणभर की झलक!
मेरे लिए पीला गुलाब
मित्रता का प्रतीक नहीं,
मेरे सपनों की पहचान बन गया है।
-बेला विरदी
