शराफत

आपकी शराफत को अक्सर,
मूर्खता समझ लिया जाता है।
हंसकर बात करने वाले को,
यूं ही हल्के में लिया जाता है।
अपनों की पहचान करना,
सबसे कठिन सफर होता है।
जिसे अपना समझ बैठते हैं,
वही चालबाज खंजर घोंपता है।
ऐसा नहीं कि शराफत,
धोखों से अनजान रहती है।
सब समझकर भी खामोश,
बस दोस्ती का मान रखती है।
ये दुनिया बहुत अजीब है,
रोते को देखकर हंसती है।
गिरते हुए इंसानों पर भी,
तालियां खुलकर बजती हैं।
शराफत कमजोरी नहीं,
चरित्र की सच्ची पहचान है।
समय ही आखिर बतलाता,
कौन अपना, कौन अनजान है।

मुनीष भाटिया
ऐरो सिटी
मोहाली

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