-सृष्टि के कल्याण और निर्विघ्न कार्यों के लिए ऋषियों ने पूछा देवता का नाम, सूतजी ने बताया—श्रीगणेश ही हैं सर्वप्रथम पूजनीय
-शीतल अवस्थी
प्राचीन काल में एक बार नैमिषारण्य में कथावाचक सूतजी का आगमन हुआ। वहां तपस्या कर रहे ऋषि-मुनियों ने उनका आदर-सत्कार किया और उचित आसन पर बैठाया। इसके बाद उन्होंने सूतजी से प्रार्थना की, ङ्खहे महात्मन्! आप लौकिक और पारलौकिक ज्ञान से परिपूर्ण तथा कथा-वाचन में सिद्धहस्त हैं। कृपया हमें ऐसी कथा सुनाइए, जिससे हमारा और समस्त प्रजा का कल्याण हो।ङ्ग
ऋषियों का अनुरोध सुनकर सूतजी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश परब्रह्म के तीन प्रमुख स्वरूप हैं। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, भगवान विष्णु उसका पालन करते हैं और रुद्र परिवर्तन एवं संहार के माध्यम से सृष्टि के नए निर्माण का मार्ग खोलते हैं।
सूतजी ने सृष्टि की उत्पत्ति का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि ब्रह्माजी ने सबसे पहले मानसिक सृष्टि की रचना की, लेकिन उनकी प्रजा संसार के विस्तार में प्रवृत्त नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने तामसी और राजसी सृष्टि की रचना की। फिर मनु और शतरूपा के माध्यम से मैथुनी सृष्टि का विस्तार आरंभ हुआ।
स्वयंभू मनु और शतरूपा से प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति तथा प्रसूति नामक पुत्रियां उत्पन्न हुईं। मनु ने प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति तथा आकूति का विवाह रुचि प्रजापति से किया। इन्हीं वंशों के माध्यम से संसार में प्रजा का विस्तार हुआ। समय के साथ देवता, ऋषि, असुर तथा विभिन्न जीवों की उत्पत्ति हुई और सृष्टि निरंतर आगे बढ़ती गई।
सृष्टि की यह कथा सुनकर ऋषि-मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने सूतजी से पुनः प्रश्न किया, ङ्खऐसा कौन-सा देवता है, जिसकी आराधना से हमारे और आने वाली पीढ़ियों के सभी कल्याणकारी कार्य बिना किसी बाधा के पूरे हो सकें? हमें किस देवता को सर्वप्रथम पूजना चाहिए?ङ्ग
तब सूतजी ने उत्तर दिया, ङ्खऐसे देवता केवल भगवान महादेव और माता पार्वती के पुत्र श्रीगणेश हैं। वे गणों के स्वामी, बुद्धि और सिद्धि के दाता तथा समस्त विघ्नों का नाश करने वाले हैं। इसीलिए वे ‘प्रथमेश’ कहलाते हैं।ङ्ग
‘प्रथमेश’ का अर्थ है—सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता। किसी भी यज्ञ, अनुष्ठान, विवाह, गृहप्रवेश अथवा मांगलिक कार्य से पहले श्रीगणेश की आराधना करने की परंपरा इसी विश्वास से जुड़ी है। मान्यता है कि गणपति का स्मरण मनुष्य की बुद्धि को स्थिर करता है, गलत निर्णयों से बचाता है और कार्य के मार्ग में आने वाले विघ्नों को दूर करता है।
इसीलिए प्रत्येक शुभ कार्य का आरंभ इस प्रार्थना से किया जाता है—
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
