मुख्यपृष्ठनए समाचारबिरयानी पर भी महंगाई के बादल!..चावल उत्पादन में एक करोड़ टन तक...

बिरयानी पर भी महंगाई के बादल!..चावल उत्पादन में एक करोड़ टन तक गिरावट का अंदेशा; घरेलू दाम चढ़ने लगे, दो दशक की सबसे बड़ी कमी का खतरा

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
महंगाई की मार अब बिरयानी की प्लेट तक पहुंच सकती है। कमजोर मानसून के कारण २०२६-२७ में भारत का चावल उत्पादन करीब एक करोड़ टन, यानी लगभग ६.५ प्रतिशत, घटने का अनुमान लगाया जा रहा है। अगर उद्योग विशेषज्ञों का यह प्रारंभिक आकलन सही बैठा तो यह दस साल में पहली सालाना गिरावट और २००९-१० के बाद चावल उत्पादन में सबसे बड़ी कमी होगी।
इस साल देश में मानसूनी बारिश सामान्य से करीब १५ प्रतिशत कम रही है, जबकि कुछ प्रमुख धान उत्पादक इलाकों में कमी ४२ प्रतिशत तक पहुंची। ११ सितंबर तक धान का रकबा भी पिछले साल के मुकाबले करीब ४ प्रतिशत कम था। इसका असर अब बाजार में दिखने लगा है और घरेलू चावल के दाम चढ़ना शुरू हो चुके हैं।
इसका सबसे सीधा असर बिरयानी, पुलाव, होटल-रेस्तरां और रोजमर्रा के घरेलू बजट पर पड़ सकता है। खासकर, बेहतर किस्म और प्रीमियम चावल महंगे होने की आशंका है। निर्यात कीमतें भी एक साल से अधिक के उच्चस्तर पर पहुंच गई हैं।
एक सितंबर को सरकारी चावल भंडार, बिना कुटे धान सहित, करीब ५.९६ करोड़ टन था, जो अक्टूबर के निर्धारित बफर लक्ष्य १.०३ करोड़ टन से कई गुना अधिक है। यही भारी भंडार फिलहाल घरेलू उपलब्धता और निर्यात दोनों के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है।
एक करोड़ टन की गिरावट सरकारी अंतिम अनुमान नहीं, बल्कि उद्योग विशेषज्ञों का शुरुआती आकलन है। विशाल सरकारी भंडार के कारण फिलहाल निर्यात प्रतिबंध की आशंका कम है। लेकिन उत्पादन घटा और कीमतें चढ़ीं तो असर सिर्फ चावल तक सीमित नहीं रहेगा, बिरयानी की प्लेट, होटल का मेन्यू और घर की रसोई तीनों पर महंगाई का तड़का लग सकता है।
चीनी, चावल, दाल,
तेल रसोई पर चौतरफा दबाव!
चावल: कमजोर मानसून के कारण उत्पादन में करीब एक करोड़ टन तक गिरावट का अनुमान है और घरेलू कीमतें चढ़ने लगी हैं।
चीनी: उत्पादन अनुमान घटा है, कीमतें हाल में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचीं और सरकार को जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा घटानी पड़ी। हालांकि केंद्र का कहना है कि फिलहाल देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है।
दालें: कम बारिश से तुअर और चना जैसी प्रमुख दालों की फसल पर दबाव है और बाजार भाव ऊपर जा रहे हैं।
खाद्य तेल: एक साल में वनस्पति तेल की कीमतें करीब २० प्रतिशत बढ़ चुकी हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग दो-तिहाई खाद्य तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक महंगाई सीधे रसोई तक पहुंच रही है।
प्याज: अगस्त में प्याज की महंगाई करीब ४८ प्रतिशत रही। अदरक और लहसुन भी महंगे हुए हैं।

थाली पर एक साथ कई वार!
चावल महंगा, चीनी दबाव में, दालें चढ़ीं, तेल पहले से महंगा और प्याज ने भी आंखें नम कर दीं। त्योहारी मौसम से पहले आम परिवार की रसोई पर महंगाई का दबाव कई मोर्चों से बढ़ता दिखाई दे रहा है।

अन्य समाचार