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नौ साल बाद आरबीआई ने बाजार से खींचे `५० हजार करोड़!

-सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग व्यवस्था की अतिरिक्त नकदी सोखी; अगले दो हफ्तों में `२५-२५ हजार करोड़ की दो और बिक्री

सामना संवाददाता / मुंबई
बैंकिंग व्यवस्था में जरूरत से ज्यादा नकदी बढ़ने के बाद रिजर्व बैंक ने नौ साल बाद बड़ा नकदी-कसाव शुरू किया है। आरबीआई ने खुले बाजार की नीलामी के जरिए सरकारी बॉन्ड बेचकर बैंकिंग व्यवस्था से ५०,००० करोड़ की अतिरिक्त नकदी सोख ली। करीब नौ साल में यह पहली नीलामी-आधारित खुले बाजार की बॉन्ड बिक्री है। केंद्रीय बैंक अगले दो हफ्तों में २५- २५ हजार करोड़ की दो और बॉन्ड बिक्री करने वाला है।
सितंबर की शुरुआत में बैंकिंग व्यवस्था में अतिरिक्त नकदी बढ़कर करीब ११.६ लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। हालांकि, कर भुगतान, विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और अन्य उपायों के चलते अब यह घटकर करीब ७.४ लाख करोड़ रह गई है। इसके बावजूद व्यवस्था में मौजूद नकदी इतनी अधिक थी कि अल्पकालिक ब्याज दरें आरबीआई की नीतिगत दर से नीचे दबने लगी थीं। आरबीआई की चिंता यह है कि बैंकिंग व्यवस्था में जरूरत से ज्यादा सस्ती नकदी रहने से मौद्रिक नीति का असर कमजोर पड़ सकता है। खासकर ऐसे समय में जब कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और रुपये पर दबाव महंगाई की चुनौती बढ़ा सकता है। ऐसे में सरकारी बॉन्ड बेचकर अतिरिक्त नकदी सोखने का कदम बैंकिंग व्यवस्था में तरलता को संतुलित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
बॉन्ड बिक्री के बीच बाजार में यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि आरबीआई अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर में ०.२५ प्रतिशत की बढ़ोतरी कर सकता है। हालांकि, यह फिलहाल बाजार का अनुमान है। आरबीआई ने ऐसी किसी दर वृद्धि की घोषणा नहीं की है।
ईएमआई पर कब पड़ेगा असर?
५०,००० करोड़ की बॉन्ड बिक्री का मतलब यह नहीं है कि गृह ऋण या कार ऋण की ईएमआई तुरंत बढ़ जाएगी। बॉन्ड बिक्री का तत्काल उद्देश्य बैंकिंग व्यवस्था की अतिरिक्त नकदी को कम करना है। यदि तरलता लगातार घटती है तो बैंकों के लिए धन जुटाने की लागत बढ़ सकती है। इसके बाद अगर आरबीआई रेपो दर भी बढ़ाता है, तभी नए और परिवर्तनीय ब्याज दर वाले कर्ज पर ब्याज बढ़ने का असर ज्यादा साफ दिखाई दे सकता है।

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