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रुख-ए-सियासत : दिया जलाओ, सेल्फी बनाओ कौन सा दिल जला यह मत पूछो!

-तौसीफ कुरैशी

सरकार का दीया है सरकारी तरीके से जलाइए। बात सिर्फ इतनी होती तो शायद कोई सवाल भी नहीं उठता। मगर जब दीया जलाने का लक्ष्य तय हों, ग्राम पंचायतों को संख्या बताई जाए, अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक की वीडियो कॉन्फ्रैसिंग सिंग होने लगे और दीया जलाने के बाद उसकी सेल्फी भी ऊपर भेजनी पड़े, तब सवाल दीये का नहीं रहता सवाल यह हो जाता है कि यह रोशनी है या सरकारी मशीनरी की परीक्षा? १६ सितंबर को उत्तर भारत के कई जिलों में, स्थानीय स्तर पर मिल रही सूचनाओं के मुताबिक, ‘दिया जलाओ और सेल्फी भेजो’ जैसी कवायद में सरकारी अमला लगाया गया। कहीं ग्राम सखी, कहीं बैंकिंग से जुड़ी महिलाकर्मी, कहीं स्वयं सहायता समूह और कहीं पंचायत स्तर के कर्मचारी इस अभियान को पूरा कराने में जुटे बताए जा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि कुछ ग्राम पंचायतों को बड़ी संख्या में दीये जलाने का लक्ष्य दिया गया है। अब जरा कल्पना कीजिए, जिस कर्मचारी को गांव की किसी विधवा की पेंशन देखनी थी, किसी किसान की समस्या सुननी थी, किसी महिला समूह का काम निपटाना था, वह आज दीये गिन रहा है। जिससे सरकारी योजना का लाभ किसी जरूरतमंद तक पहुंचाना था, वह यह देख रहा है कि सेल्फी में कितने चेहरे साफ आ रहे हैं। अधिकारी पूछ रहा है दीये कितने जले? कर्मचारी जवाब दे रहा है सर, फोटो भेज दी है।
यानी विकास का नया पैमाना शायद यह बन गया है कि काम हुआ या नहीं, इससे पहले फोटो आई या नहीं। सरकारी व्यवस्था में जनभागीदारी अच्छी बात है। धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में लोग अपनी इच्छा से शामिल हों, इसमें भी कोई बुराई नहीं। लेकिन जब किसी कार्यक्रम की सफलता का पैमाना यह हो जाए कि कितने सरकारी कर्मचारी, कितनी पंचायतें और कितनी सेल्फियां दिखाई दीं, तो फिर नागरिक सहभागिता और प्रशासनिक दबाव के बीच की रेखा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। और असली सवाल तो इससे भी बड़ा है। दीया जलवाने से यह कैसे पता चलेगा कि सरकार से कौन खुश है? जिसने हजार दीये जला दिए, क्या उसने वोट भी हजार बार सरकार को दे दिया? और जिसने दिया नहीं जलाया, क्या वह सरकार का विरोधी हो गया? लोकतंत्र में मन की रोशनी किसी सेल्फी कैमरे में कैद नहीं होती। वोटर का मन न वीडियो कॉन्फ्रैसिंग से पढ़ा जा सकता है, न दीयों की गिनती से और न ही सरकारी रिपोर्ट की चमकदार तस्वीरों से। नफरत के सहारे राजनीति करने वाले यह मान लें कि कुछ तस्वीरें बहुत बड़ी भीड़ नहीं बनातीं और कुछ चुप्पियां हमेशा समर्थन नहीं होतीं। सरकारी मशीनरी का काम नागरिक को सुविधा देना है, उसके हाथ में दीया थमाकर उसकी तस्वीर ऊपर भेजना नहीं। वरना कल को कोई यह भी पूछ सकता है दीये तो हजार जला दिए साहब, मगर जनता के मन में कितनी रोशनी हुई। हर-हर…घर-घर…

सत्यमेव जयते..!

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