-मनपा की सूची में १७४ खतरनाक इमारतें, म्हाडा ने अलग से ८२ को बताया -‘अति खतरनाक’; २,७३६ लोग अब भी ऐसी इमारतों में-दिल्ली की सात मौतों के बाद भी मुंबई के पीजी-हॉस्टलों का व्यापक ऑडिट कहां है?
सामना संवाददाता / मुंबई
दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत गिरी, सात लोगों की जान गई और उसके बाद पूरा सरकारी तंत्र जाग उठा। मालिक गिरफ्तार हुआ, पांच नगर निगम अधिकारी निलंबित हुए, पीजी की सुरक्षा जांच शुरू हुई और दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सरकार से पूछा कि आखिर छात्रों को सुरक्षित आवास देने और पीजी के नियमन के लिए व्यवस्था क्या है। लेकिन दिल्ली से करीब १,४०० किलोमीटर दूर मुंबई में सवाल और बड़ा है-यहां कितने ‘सत्य निकेतन’ किसी हादसे का इंतजार कर रहे हैं?
दिल्ली में सात मौतों के बाद सरकार जागी। मुंबई को उसी कीमत पर सीखने की जरूरत नहीं है।
अब छह सवालों का जवाब दे सरकार
– मुंबई में कुल पंजीकृत और गैर-पंजीकृत पीजी कितने हैं?
– पिछले तीन वर्षों में कितने पीजी और हॉस्टलों का फायर ऑडिट हुआ?
– ३० साल से ज्यादा पुरानी कितनी इमारतों में पीजी चल रहे हैं?
– कितने पीजी के पास वैध ऑक्युपेंसी और उपयोग संबंधी अनुमति है?
– कितनों में आपात निकास, फायर अलार्म और अग्निशमन व्यवस्था उपलब्ध है?
-दिल्ली हादसे के बाद महाराष्ट्र सरकार ने विशेष पीजी सुरक्षा अभियान क्यों नहीं घोषित किया?
मुंबई में पीजी और डॉर्मिटरी का हाल-बेहाल
मुंबई में खतरा काल्पनिक नहीं है। अप्रैल २०२६ में बीएमसी ने अपने प्री-मॉनसून सर्वे में १७४ इमारतों को खतरनाक और जर्जर बताया था। इसी सर्वे में शहर में २४९ भूस्खलन संभावित स्थान भी चिन्हित किए गए थे।
इसके अलावा म्हाडा के मुंबई बिल्डिंग रिपेयर एंड रिकंस्ट्रक्शन बोर्ड ने मई २०२६ में दक्षिण और मध्य मुंबई की ८२ इमारतों को ‘अति खतरनाक’ श्रेणी में रखा। इनमें ४३ इमारतें ऐसी थीं, जो पिछले साल भी खतरनाक सूची में थीं। यानी चेतावनी नई नहीं है, खतरा लगातार बना हुआ है।
सबसे चिंताजनक आंकड़ा
सबसे चिंताजनक आंकड़ा यह है कि इन ८२ खतरनाक म्हाडा इमारतों में उस समय २,७३६ लोग रह रहे थे-इनमें २,२५६ आवासीय और ४८० गैर-आवासीय ऑक्युपेंट थे। म्हाडा ने १७६ लोगों को खाली करने के नोटिस दिए थे, लेकिन रिपोर्ट के समय केवल २९ लोग ट्रांजिट कैंप में गए और ३६ ने वैकल्पिक व्यवस्था की थी। बाकी को खाली कराने की प्रक्रिया जारी थी।
जून २०२६ में दक्षिण मुंबई के फोर्ट, सीएसएमटी, बैलार्ड एस्टेट और डॉक क्षेत्र के होटल तथा डॉर्मिटरी पर किए गए एक रियलिटी चेक में सुरक्षा व्यवस्था असमान मिली। कुछ प्रतिष्ठानों में आपातकालीन व्यवस्था और फायर सेफ्टी में स्पष्ट खामियां सामने आर्इं।
यह महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि मुंबई में चर्चगेट से माटुंगा, दादर, सांताक्रुज, कालीना, विले पार्ले, अंधेरी और पवई तक हजारों छात्र, प्रतियोगी परीक्षार्थी और नौकरीपेशा युवा छोटे पीजी, हॉस्टल, डॉर्मिटरी और बदले हुए आवासीय फ्लैटों में रहते हैं। लेकिन सवाल है कि सरकार के पास इन सभी निजी पीजी का समेकित डेटा है भी या नहीं? कितनों का स्ट्रक्चरल ऑडिट हुआ? कितनों के पास वैध ऑक्युपेंसी प्रमाणपत्र है? कितनों में फायर एग्जिट है? कितने आवासीय फ्लैटों को व्यावसायिक छात्र आवास में बदल दिया गया है?
कानून पहले से मौजूद है
महाराष्ट्र में नियमों की कमी भी बहाना नहीं हो सकती। महाराष्ट्र फायर प्रिवेंशन एंड लाइफ सेफ्टी कानून और नेशनल बिल्डिंग कोड के तहत लॉजिंग, बोर्डिंग और डॉर्मिटरी जैसी गतिविधियां अलग सुरक्षा मानकों के दायरे में आती हैं। महाराष्ट्र फायर एंड इमरजेंसी सर्विसेज की आधिकारिक व्यवस्था में फायर ऑडिट और मंजूरी के नियम पहले से मौजूद हैं।
मुंबई में ३० साल से अधिक पुरानी हर आवासीय या गैर-आवासीय इमारत का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराना कानूनन जरूरी है। बीएमसी के आधिकारिक नोटिस के मुताबिक, यह जांच बीएमसी में पंजीकृत योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर से करानी होती है। यदि मरम्मत सुझाई जाए तो उसे निर्धारित समय में पूरा कर स्ट्रक्चरल फिटनेस सर्टिफिकेट देना होता है। यानी कानून भी है, इंजीनियर भी हैं, फायर ऑडिटर भी हैं और बीएमसी के २४ वार्डों का पूरा प्रशासनिक ढांचा भी।
मुंबई पहले भी भुगत चुकी है
यह खतरा नया नहीं है। २०१७ में घाटकोपर की सिद्धि साई इमारत गिरने से १७ लोगों की मौत हुई थी। जांच में सामने आया था कि ३० साल पुरानी होने के बावजूद वह उस सूची में नहीं थी, जिसके आधार पर स्ट्रक्चरल ऑडिट के नोटिस दिए जाने थे। जांच समिति ने यह भी पाया था कि संबंधित विभाग ने पुरानी इमारतों की सूची वर्षों तक अपडेट नहीं की थी। यानी मुंबई के पास अपना ‘सत्य निकेतन’ जैसा सबक पहले से मौजूद है। फिर भी आज दिल्ली की त्रासदी के बाद महाराष्ट्र सरकार की ओर से यदि मुंबई के सभी निजी पीजी, छात्र हॉस्टल और डॉर्मिटरी का समयबद्ध संयुक्त स्ट्रक्चरल और फायर ऑडिट घोषित नहीं होता, तो यह गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जाएगी। महाराष्ट्र सरकार के पास चेतावनी भी है, कानून भी, पुराने हादसों का इतिहास भी और खतरनाक इमारतों की सूची भी। अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो अगला हादसा ‘दुर्घटना’ नहीं, प्रशासनिक विफलता कहलाएगा।
