-यूएन की चेतावनी ने खोली ‘वर्ल्ड क्लास मुंबई’ के विकास मॉडल की पोल
-समुद्र बढ़ा तो सिर्फ सड़कें नहीं, पूरा शहर डूबने के खतरे में
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के नाम पर हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं दौड़ रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ समंदर चुपचाप शहर की चौखट तक दस्तक दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा चेतावनी ने मुंबई के विकास मॉडल पर ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। खतरा सिर्फ बारिश में सड़कों पर पानी भरने का नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में मुंबई की जमीन, बस्तियों, कारोबार और बुनियादी ढांचे पर समुद्र के स्थायी दबाव का है।
फ्लाईओवर बनेंगे, लेकिन शहर बचेगा कैसे?
मुंबई में तटीय सड़कें, ऊंची इमारतें, पुल और मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं तेजी से खड़ी हो रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं में ५०-१०० साल बाद की मुंबई का भी हिसाब है? समुद्र बढ़ने के साथ जमीन धंसने, खारे पानी के भूजल में घुसने और तूफानी लहरों का खतरा बढ़ सकता है। इसका सीधा असर पेयजल, परिवहन, स्वच्छता, आवास और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
खतरा नया नहीं, चेतावनी पुरानी है!
मुंबई क्लाइमेट एक्शन प्लान भी समुद्री जलस्तर में वृद्धि, तूफानी लहरों और तटीय जलभराव के बढ़ते जोखिम को रेखांकित कर चुका है। यानी खतरे की घंटी पहले से बज रही है, लेकिन सवाल यह है कि प्रशासन की तैयारी कितनी तेज है? मुंबई को सिर्फ चमकदार सड़कें और ऊंची इमारतें नहीं, क्लाइमेट शील्ड चाहिए। मैंग्रोव बचाने होंगे, ड्रेनेज मजबूत करना होगा, बाढ़ चेतावनी प्रणाली खड़ी करनी होगी और तटीय इलाकों के लिए दीर्घकालीन सुरक्षा नीति बनानी होगी।
आज समुद्र बढ़ रहा है, कल मुंबई की जमीन घटेगी!
ळर् के मुताबिक, २०१४ से २०२३ के बीच वैश्विक समुद्र स्तर औसतन ४.७ मिलीमीटर सालाना बढ़ा, लेकिन २०२४ में यह वृद्धि रिकॉर्ड ५.९ मिलीमीटर तक पहुंच गई। रिपोर्ट में मुंबई, कोलकाता और ढाका को उन दक्षिण एशियाई शहरों में शामिल किया गया है जहां समुद्र-स्तर बढ़ने और जमीन धंसने से स्थायी जलभराव तथा विस्थापन का खतरा बढ़ रहा है। इन तीन शहरों में १.४ करोड़ से ज्यादा लोगों के जोखिम में होने की चेतावनी दी गई है।
