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लड़कों के यौन शोषण को भी मिले समान संवेदनशीलता और संरक्षण: सामाजिक चिंतक चंद्रवीर यादव का गंभीर सवाल

बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा, भागदौड़ भरी ज़िंदगी और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की चुनौतियाँ दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही हैं। इसी कड़ी में एक अत्यंत संवेदनशील लेकिन अक्सर अनदेखे विषय की ओर ध्यान दिलाते हुए महाराष्ट्र के वरिष्ठ सामाजिक चिंतक और शिक्षाविद् चंद्रवीर बंशीधर यादव ने लड़कों के यौन शोषण को लेकर एक गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाला मुद्दा उठाया है। उनका मानना है कि जिस प्रकार समाज और प्रशासन बालिकाओं के यौन उत्पीड़न के मामलों में तत्परता दिखाते हैं, वैसी ही गंभीरता अब लड़कों के मामलों में भी आवश्यक हो गई है।

मानसिक समस्याओं में भारी इजाफा, बच्चे हो रहे हैं शिकार

यादव ने अपने विचार में यह स्पष्ट किया कि ग्लोबलाइजेशन के इस युग में इंसान 12 से 18 घंटे तक काम कर रहा है। फलस्वरूप घबराहट, अवसाद, अनिद्रा, क्रोध और मानसिक थकान जैसी समस्याएँ आम होती जा रही हैं। परिवारों के पास खुद के लिए तक समय नहीं बच रहा, बच्चों से संवाद और उनकी समस्याओं की पड़ताल तो बहुत दूर की बात हो गई है। ऐसे माहौल में कई बार बच्चे — ख़ासतौर पर लड़के — यौन शोषण का शिकार हो जाते हैं, लेकिन वे इसे पहचान नहीं पाते या शर्म और सामाजिक डर के चलते चुप रह जाते हैं।

“लड़कों के यौन शोषण को नज़रअंदाज़ करना बेहद खतरनाक” — यादव

चंद्रवीर यादव का स्पष्ट मानना है कि समाज अब भी यह मानकर चलता है कि यौन शोषण का शिकार केवल लड़कियाँ होती हैं, जबकि हकीकत यह है कि लड़के भी उतने ही असुरक्षित हैं। कई बार तो हमलावर उनके करीबी रिश्तेदार, शिक्षक या सीनियर ही होते हैं। हादसे के बाद लड़के या तो डर से चुप रह जाते हैं या उन्हें यह तक नहीं समझ आता कि उनके साथ क्या हुआ है।

उन्होंने चिंता जताई कि ऐसे अनुभव बच्चों के व्यक्तित्व पर गहरा मानसिक आघात छोड़ते हैं, जिससे वे आगे चलकर कुंठित, आत्मग्लानि से ग्रसित या असामाजिक व्यवहार की ओर झुक सकते हैं। कई मामलों में अवसाद इतना गहरा हो जाता है कि आत्महत्या तक की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है।

समाज और प्रशासन की दोहरी संवेदनशीलता पर सवाल

यादव ने प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जैसे बालिकाओं के मामलों में पुलिस, समाज और संस्थाएँ फौरन सक्रिय हो जाती हैं, वैसे ही लड़कों के मामलों में भी समर्पित हेल्पलाइन, परामर्श केंद्र और कानूनी संरक्षण की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों को ‘कम गम्भीर’ मानकर यह सोच लेना कि लड़कों को गर्भवती नहीं होना पड़ता, एक बेहद संवेदनहीन और खतरनाक सोच है।

उन्होंने एक और गंभीर पहलू उजागर किया कि भारतीय जेलों में कैदियों द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न के चलते आत्महत्या के मामले सबसे अधिक पाए जाते हैं, जो बताता है कि यह समस्या कितनी विकराल है और इससे निपटने के लिए समाज और शासन को एकजुट होकर कदम उठाने की ज़रूरत है।

समाधान की ओर बढ़ने की जरूरत

इस संवेदनशील मुद्दे को संबोधित करते हुए यादव ने समाज से अपील की कि

बच्चों — खासकर लड़कों — से संवाद किया जाए
उन्हें सुरक्षित महसूस कराने के लिए खुला वातावरण तैयार किया जाए
स्कूलों और संस्थानों में यौन शिक्षा को संवेदनशील ढंग से शामिल किया जाए
प्रशासन लड़कों के मामलों को लेकर जागरूकता फैलाए और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करे
समाज में यह सोच बदले कि यौन शोषण केवल लड़कियों तक सीमित समस्या है

आज जब मानसिक स्वास्थ्य और बच्चों की सुरक्षा जैसे विषय वैश्विक चिंता बन चुके हैं, ऐसे में लड़कों के यौन शोषण पर चुप्पी कहीं न कहीं एक सामाजिक अपराध जैसा है। चंद्रवीर बंशीधर यादव जैसे सामाजिक चिंतकों की यह पहल प्रशंसनीय है, जो समाज को एक समावेशी और न्यायसंगत दृष्टिकोण की ओर ले जाने की कोशिश कर रही है।

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