सैयद सलमान
मुंबई
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने एक ऐसी तस्वीर उकेरी है जो भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक तो है ही, मुसलमानों के राजनीतिक भविष्य के लिए भी गंभीर सवाल खड़े करती है। विपक्ष से मुस्लिम उम्मीदवारों का जीतना दरअसल इस चिंता का बड़ा कारण है। वर्षों से जारी सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति ने समाज को दो खेमों में बांट दिया है। मुसलमानों ने सामूहिक रूप से विपक्ष के पाले में खड़े होकर अपनी सुरक्षा खोजने की कोशिश की है। लेकिन यह रणनीति उन्हें सुरक्षित नहीं बना रही, बल्कि एक नई मुश्किल में फंसा रही है। असम में कांग्रेस ने ७९ गैर-मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, उनमें से सिर्फ १ जीता, लेकिन २० मुस्लिम उम्मीदवारों में से १८ ने जीत दर्ज की। केरल में ३५ मुस्लिम विधायक चुने गए, जिनमें ३० कांग्रेस नीत यूडीएफ गठबंधन से हैं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की दोनों सीटें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीतीं। यह आंकड़े संयोग नहीं हैं।
यह ध्रुवीकरण का नतीजा है
असम इस विरोधाभास की सबसे तीखी प्रयोगशाला है। हिमंता बिस्वा सरमा जैसे बदजुबान नेता के नेतृत्व में भाजपा ने १०२ सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। अब असम की विधानसभा में विपक्ष की कुर्सियों पर बैठे ज्यादातर विधायक मुस्लिम होंगे। इसका अर्थ यह है कि जब भी विपक्ष कोई मुद्दा उठाएगा, वह स्वाभाविक रूप से मुस्लिम आवाज के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। विधायकों की मजबूरी होगी कि वे अपने मतदाताओं के मुद्दे उठाएं और सरमा की चतुर राजनीति उसे हर बार हिंदू-मुस्लिम बहस में तब्दील करने का अवसर पाएगी। ध्रुवीकरण के लिए इससे बेहतर जमीन क्या हो सकती है?
पश्चिम बंगाल का दृश्य और भी पेचीदा है। मुर्शिदाबाद में टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने ६ दिसंबर को रजीनगर में बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक मस्जिद की नींव रखी और इसे अपना चुनावी मुद्दा बनाया। उन्होंने मुसलमानों की अलग राजनीतिक पहचान का दावा किया। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस इलाके को ‘प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता की प्रयोगशाला’ करार दिया। भाजपा को इस से लाभ ही होगा। जितना मुस्लिम मुद्दा गरमाएगा, उतना ही हिंदू एकजुटता का अवसर मिलेगा। इस आग में जाहिरी तौर पर यही दिखा कि सियासी हाथ कबीर सेंक रहे हैं, जबकि हकीकत में लाभ भाजपा का है।
समस्या की जड़ यह है कि मुसलमान एक ऐसे राजनीतिक चक्र में फंसा है, जहां उसका हर कदम उसके विरुद्ध जाता है। वह विपक्ष के साथ खड़ा होता है तो भाजपा उसे मुस्लिम तुष्टिकरण का प्रमाण बताती है। वह चुप रहता है तो विपक्ष कमजोर होता है। वह अपनी अलग आवाज उठाता है तो ध्रुवीकरण और तेज होता है। हर स्थिति में लाभ एक ही पक्ष को होता है।
विपक्ष को इस समीकरण की गंभीरता समझनी होगी। जब किसी दल की जीत का एकमात्र आधार एक समाज बन जाए, तो वह दल उसका प्रतिनिधि नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी बन जाता है। केरल अपवाद इसलिए है क्योंकि वहां विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का साझा ढांचा मजबूत है। लेकिन असम और बंगाल में विपक्ष को मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू मतदाताओं का विश्वास भी जीतना होगा। इसके लिए उसे मुद्दा आधारित राजनीति करनी होगी, जिसमें रोजगार, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीविका जैसे मुद्दे शामिल हों।
आत्ममंथन की दरकार
मुसलमानों को भी इस पर सोचना होगा। वोटबैंक बनना एक ऐसी भूमिका है, जिसमें आप ताकत नहीं, कमज़ोरी बन जाते हैं। जब वोट एकमुश्त किसी एक दल को जाता है तो उस दल के पास आपको गंभीरता से लेने की कोई राजनीतिक मजबूरी नहीं रहती। जो उम्मीदवार बेहतर हो, जिसकी नीतियां ज्यादा फायदेमंद हों उसे चुनने का रास्ता दीर्घकालिक राजनीतिक सम्मान दिलाएगा। इसलिए मुस्लिम समुदाय को भी आत्ममंथन की जरूरत है। उसे केवल एक ‘वोटबैंक’ बनकर रहने के बजाय ‘मुद्दा आधारित वोटिंग पैटर्न’ अपनाना होगा। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं जैसे धर्मनिरपेक्ष मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। जब चुनावी लड़ाई ‘मंदिर बनाम मस्जिद’ या ‘पहचान बनाम वजूद’ की होती है तो नुकसान हमेशा अल्पसंख्यकों का ही होता है। लेकिन जब लड़ाई ‘नीति बनाम नीयत’ और ‘विकास बनाम विनाश’ की होगी, तब ध्रुवीकरण की धार कुंद पड़ने लगेगी।
भारत का लोकतांत्रिक ढांचा जिस दिशा में जा रहा है, वह सर्वसमावेशी नहीं, बल्कि विभाजनकारी है। जब चुनाव धर्म के आधार पर लड़े और जीते जाएं, जब जनप्रतिनिधि पहले मुसलमान या हिंदू हों और बाद में नागरिक, तब लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देता है। ये चुनावी आंकड़े सिर्फ जीत-हार की कहानी नहीं हैं, ये बताते हैं कि देश की साझी विरासत किस तरह दरक रही है। इस दरार को पाटना होगा और यह काम न भाजपा करेगी, न हुमायूं कबीर। यह जिम्मेदारी उन लोगों की है जो अभी भी यकीन रखते हैं कि भारत की पहचान किसी एक धर्म से नहीं, सबकी साझेदारी से बनती है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग म्ों समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
