रुह चाहती है

मेरा रुहानी पखेरु उड़ना चाहता है
दिल की पंखुड़ियां फैलाना चाहता है
कुछ गुनगुनाना चाहता है
अपने ख्वाबों को हकीकत में
बदलना चाहता है
मन की अग्नि को
ठंडक देना चाहता है
ठंडी हवा में झूम के
लहराना चाहता है
अपने तन मन के बगीचे में
खुशबू महकाना चाहता है
प्यार के रंगों में रंगना चाहता है
किसी की नज़रों से मिल कर
रंग रलिया मनाना चाहता है
अपनी सिमटी हुई आकांक्षाओं
को समर्थन देना चाहता है
सात रंगों से अपनी आशाओं को
पार लगाना चाहता है
कोई इसे रोके, कोई टोके
यह फिर भी आगे बढ़ना चाहता है
दरिया की शीत लहरों की
तरंगों में घुलना चाहता है
आसमां से बतिया के
चांद तारों को छूना चाहता है
काली घटा के बादलों में
उगते सूरज की किरणें
बिखेरना चाहता है
कोई इसे समझाए तो नामुमकिन
को भी मुमकिन करना चाहता है

अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

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