मुख्यपृष्ठस्तंभसम-सामयिक : बिहार में वोटर लिस्ट पुनर्निरीक्षण ...हंगामा है क्यों बरपा..!!

सम-सामयिक : बिहार में वोटर लिस्ट पुनर्निरीक्षण …हंगामा है क्यों बरपा..!!

वीना गौतम
वोटर लिस्ट पुनर्निरीक्षण आमतौर पर निर्वाचन प्रक्रिया का एक नियमित काम होता है, ताकि मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिहीन बनाया जा सके। लेकिन जब चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को लेकर राज्य बंद और राष्ट्र बंद जैसे आह्वान होने लगें तो समझ लेना चाहिए इस प्रक्रिया को लेकर या तो राजनीतिक हस्तक्षेप की गलतफहमी है या वाकई हस्तक्षेप की मजबूत आशंका है।
बिहार में चल रहे मतदाता सूची के गहन पुनर्निरीक्षण कार्यक्रम के विरोध में ९ जुलाई २०२५ को अगर बिहार के समूचे विपक्षी राजनीतिक दल खड़े हुए, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्हें लग रहा है कि चुनाव आयोग की इस कवायद के बहाने राज्य सरकार उनके समर्थक वोटरों को मतदाता सूची से येन-केन-प्रकारेण बाहर करने की दबी-छुपी कोशिश कर रही है। इसलिए विपक्ष के सारे राजनीतिक दलों ने महागठबंधन बनाकर बिहार बंद का आह्वान किया। यह आंदोलन तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आगे बढ़ा और इस आंदोलन की आवाज को मजबूती देने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी पटना पहुंचे।
बिहार के समूचे विपक्षी दल के नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार चुनाव आयोग के कंधे पर बंदूक रखकर उनके समर्थकों को मतदाता सूची से बाहर निकालने का षड्यंत्र रच रही है। विरोध कर रहे विपक्षी गठबंधन द्वारा ऐसा आरोप इसलिए लगाया जा रहा है, क्योंकि वोटर लिस्ट रिवीजन के तहत चुनाव आयोग जिन ११ दस्तावेजों की मांग कर रहा है, उनमें से अधिकांश दस्तावेज बिहार के गरीब मतदाताओं के पास नहीं हैं और इससे भी बड़ी बात यह है कि बिहार के कई करोड़ लोग रोजी-रोटी के लिए फिलहाल प्रदेश से बाहर हैं। ऐसे में लोगों को आशंका है कि बिहार में गैरमौजूद मतदाताओं को भी मतदान से वंचित किया जा सकता है।
बहरहाल, राज्य सरकार और चुनाव आयोग इन आशंकाओं को सिरे से खारिज कर रहे हैं। चुनाव आयोग का कहना है यह अकेले बिहार के मतदाताओं की सूची को अंतिम रूप से गहन पुनर्निरीक्षण की प्रक्रियाभर नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों में यही पुनर्निरीक्षण प्रक्रिया हर उस राज्य में दोहराई जाएगी, जहां २०२९ के पहले विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक मतदाता सूची पुनर्निरीक्षण का अगला दौर असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में चलने वाला है। बिहार चुनाव के बाद इन राज्यों का नंबर आएगा। जबकि इन राज्यों में पुनर्निरीक्षण हो चुकने के बाद यूपी, गुजरात, पंजाब, हिमाचल, गोवा और मणिपुर में भी यही प्रक्रिया दोहराई जाएगी, क्योंकि इन सभी राज्यों में भी २०२७ के पहले विधानसभा चुनाव होने हैं।
लेकिन सहज रूप से समझ में आने वाली यह बात अगर विपक्षी पार्टियां नहीं समझ रहीं, विशेषकर बिहार में, तो इसके कुछ ठोस कारण हैं। दरअसल, चुनाव आयोग ने बिहार में गहन मतदाता सूची पुनर्निरीक्षण कार्यक्रम के तहत जिन दस्तावेजों को माननीय कानूनी दस्तावेज मानने से इनकार कर दिया है, उनमें आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज हैं। गोया कि यह सच है कि अतीत में फर्जी राशन कार्ड और आधार कार्ड के हजारों मामले पकड़े गए हैं, लेकिन इस भ्रष्टाचार के लिए बलि का बकरा आम लोगों को क्यों बनाया जाए? क्यों राज्य और केंद्र की मशीनरी नकली दस्तावेज बनाने पर रोक नहीं लगा पातीं? अगर कुछ लोगों ने पैसे, संपर्कों या किसी ताकत का इस्तेमाल करके यह फर्जीवाड़ा किया है, तो इसमें उन करोड़ों आम लोगों का क्या कसूर है, जिन्होंने कभी फर्जी आधार कार्ड या फर्जी राशन कार्ड बनवाने की कोई कोशिश नहीं की।
साजिश की बू!
चुनाव आयोग और राज्य सरकार ने जिस तरह देश के इन दो सबसे मान्य दस्तावेजों को वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए जरूरी दस्तावेज नहीं माना, उससे फिर इन दस्तावेजों की कीमत क्या बची है? जबकि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट बन रहा है। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर परीक्षाएं पास की जा रही हैं। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर लोग हर कानूनी काम कर रहे हैं, तो फिर इन्हें मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का दस्तावेज क्यों नहीं माना जा रहा? अगर इन दस्तावेजों में कोई खामी है तो प्रशासनिक मशीनरी उन खामियों का पता लगाए और उसके लिए जिम्मेदार लोगों को जो सजा देनी हो, दे। लेकिन यह सरलीकरण आखिर क्यों इस्तेमाल में लाया जा रहा है कि सरकार प्रशासनिक मशीनरी को तो अपने दायित्व और अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए सीधे-सीधे इन दस्तावेजों को ही नकारने का शॉर्टकट अपना रही है।
ऐसा करने से लगता है जैसे कि हर वह आदमी चोर, भ्रष्ट और बेईमान है, जिसके पास आधार कार्ड और राशन कार्ड हैं। जबकि किसी भी आम व्यक्ति को ये दस्तावेज कहीं पड़े नहीं मिलते, शासनिक-प्रशासनिक कार्रवाइयों के बाद मिलते हैं। आज अगर इन्हें गलत या बेईमान मानकर चला जा रहा है, तो इसके लिए सरकार और प्रशासन को जिम्मेदारी लेना चाहिए बल्कि अपनी नाकामी के लिए अफसोस भी जताना चाहिए। लेकिन वाह रे होशियारी कि खुद अपनी खामियों, प्रशासनिक भ्रष्टाचार व बेईमानी पर पर्दा डालने के लिए इन दस्तावेजों को ही खारिज कर दिया। अगर चुनाव आयोग आधार कार्ड और राशन कार्ड को मान्य दास्तावेज नहीं मानता, तो फिर भारत सरकार आखिर इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर नागरिकों को वो सारी सुविधाएं क्यों देती है, जो सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं? क्यों इन्हीं आधार कार्डों के आधार पर किसानों को किसान सहायता राशि मिलती है और क्यों इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर आम नागरिक बैंकों में अपने खाते खुलवाते हैं?
अगर ये दस्तावेज गलत हैं, अगर इन्हें बेईमानी से बनाया गया है, तब तो बैंक खातों का भी दुरुपयोग हो सकता है, तो फिर बैंक खातों को क्यों इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर बने रहने दिया जा रहा है? अगर निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार की कोई गलत मंशा न भी हो, तो जिन तर्कों और आधार पर आम लोगों को मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है और मतदाता सूची में रहने के लिए वे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जो अबके पहले जरूरी दस्तावेजों के नाम पर नहीं सहेजे गए थे, तो लगता है कि ये स्थितियां पैदा करना किसी न किसी साजिश का कारण है।

जितना जल्दी हो, उतना जल्दी इस आशंका को दूर किया जाना चाहिए वर्ना राज्य सरकार और चुनाव आयोग कितनी ही ईमानदार मंशा से यह महाकवायद कर रहे हों, लेकिन सत्ता से दूर विपक्ष को इनमें शक की बू आएगी ही।
सरकारी अपराध!
बिहार सरकार ने जिन दस्तावेजों को वोटर लिस्ट में नाम होने के लिए जरूरी दस्तावेज के तौर पर मांगे हैं, वे कोई ऐसे दस्तावेज नहीं हैं, जो सबके पास हों। मसलन सरकारी कर्मचारी या पेंशनभोगी की आईडी, अब यह दस्तावेज तो हर बिहारवासी के पास हो नहीं सकता, जिनको सरकारी नौकरी नसीब हुई है, उन्हीं के पास ही होगा। दूसरा दस्तावेज है १ जुलाई १९८७ से पहले जारी सरकारी बैंक, डाकघर, एलआईसी की आईडी। अब यह करीब ३५ साल पहले का मामला। ३५ साल पहले के ये दस्तावेज, ये आईडीज कितने लोगों के पास होंगी, खास करके जिनका इस दौरान इनसे कोई नाता ही न रहा हो। चुनाव आयोग में जन्म प्रमाण पत्र को भी मतदाता सूची में नाम बनाए रखने या नाम दर्ज कराने का जरिया बनाया है। लेकिन देश में जन्म प्रमाण पत्र आखिर कितने लोगों का बनता है? इसी तरह पासपोर्ट मांगा है। पासपोर्ट बनवाना महानगरों में भले आज आसान हो गया हो, लेकिन गांव-देहात में ये आज भी पुलिस की मेहरबानी पर जारी होने वाला दस्तावेज है और पुलिस चढ़ावे के बिना बात आगे नहीं बढ़ने देती।
वैसे भी देश में अब तक एक दो नहीं सैकड़ों फर्जी पासपोर्ट भी बरामद हो चुके हैं, तो क्या अब निर्वाचन आयोग का यह मानना है कि आधार कार्ड और राशन कार्ड तो फर्जी हो सकता है, पासपोर्ट नहीं? जबकि वही सारी मशीनरी पासपोर्ट बनाने में भी लगी होती है। बोर्ड या विश्वविद्यालय का शैक्षिक प्रमाण पत्र, राज्य सरकार का स्थाई निवास प्रमाण पत्र, वन अधिकार प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, नागरिक रजिस्टर दस्तावेज, पारिवारिक रजिस्टर या सरकारी मकान अथवा जमीन के आवंटन का प्रमाण पत्र। नि:संदेह ये सभी काफी सुरक्षित दस्तावेज हैं, लेकिन इन दस्तावेजों के भी गलत होने की उतनी ही आशंकाएं हैं, जितना राशन कार्ड और आधार कार्ड के हैं और चूंकि अब तक ये दस्तावेज अंतिम रूप से जरूरी दस्तावेज नहीं रहे हैं। इसलिए जरूरी नहीं है कि सबके पास हों और अगर लोगों के पास ये दस्तावेज नहीं है, तो इसके आधार पर किसी को वोट अधिकार से वंचित कर देना अगर साजिश न भी हो, तो एक आपराधिक कार्रवाई ही होगी। इसलिए सरकार और चुनाव आयोग इस सब पर दोबारा सोचे तो बेहतर होगा।

(लेखिका विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में कार्यकारी संपादक हैं)

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