मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : ऑफिस मा चकल्लस

अवधी व्यंग्य : ऑफिस मा चकल्लस

एड. राजीव मिश्र मुंबई
आज सुबह-सुबह मेहरिया से झकझोरि के किचाहिन होइ गई। जइनसय ऑफिस जाए बिना कपड़ा पहिन के तैयार भये, वइनसय महारानी मूड़े पे सवार होइ गयीं। गैस के सिलेंडर बुक किहो? नाही यार, ऑफिस में बहुतै काम रहा। तुम्हरे ऑफिस में तो हरदमय काम रही तो फिर घर के काम? घर के काम घर पे होत है ऑफिस मा नही। इतना कहिके घर से निकरि परे। ऑफिस पहुँचे तो पूरा विभागय खाली परा रहा। चार के चारिउ एकाउंटेंट गायब। ई देखिके ऑफिस पहुँचतय दिमाग के दहिसर होइ गवा। कम्प्यूटर नही चालू कइ पाए तब तक अनीता आई गर्इं। साहब उठौ जरा, झा़ड़ू-पोंछा करै के है। क्यूँ तुम्हरी ड्यूटी तो ९ बजे से है? हाँ, आज लेट हुई गवा। काहें? आज थोड़ा लेट नींद खुली ओहिसे से लेट हुइ गवा। अबहीं तक दिमाग के फ्यूज उड़इ रहा तब तक धीरे-धीरे किरण, हिना अउर मनोज ऑफिस पहुँचि गए। सबसे बाद में डोंबिवली से मनोजवा आवा अउर अउतय, ‘आज कितनी भीड़ रही ट्रेन मा… एक बार तो अइसन लगा कि दमय निकरि जाई। सर, हम तो बहुतय घबरा गया था। रोज की तरह आजव इस्टोरी सुनाय के पसीना पोंछत मनोजवा कम्प्यूटर चालू करय मा लागि गय। लंच टाइम मा डेढ़ बजे के गय शेखर ४ बजे लउटे तो झल्लाय के हम पुछि बैठें, ‘कहाँ गय रहो ३ घंटा से?’ बाल कटवावय गए रहें अउर कहाँ जाबय।’ मनोज बोलि परें। ‘ऑफिस टाइम मा को बाल कटवावत है?’ जइसन हम कहे मनोज बोलि परें, ‘हम कटवाई थऽ, अब बोलो…? जब बाल ऑफिस टाइम में बढ़ा है तो ऑफिसय टाइम में न कटवइबै तो कब कटवइबै?’ ‘तो बाल घर पे भी बढ़ा रहा न कि तोहरे मूड़ के पूरा बाल ऑफिसय में बाढ़ि रहा है।’ हमने इतना बोलतय मनोज बोले, ‘हाँ, तो तनी धियान से देखो, टकला होइके नही आये हैं जितना बाल ऑफिस में बढ़ा रहा उतनय कटवाइ के आये हैं। पता नही रोज-रोज कहाँ झगड़ा कइके आवत हैं अउर गुस्सा हमरे ऊपर उतारत हैं।’ इतना कहत मनोजवा चाय के कप लइके रिसेप्शन के सोफा पर टांग पे टांग चढ़ाय के चाय के चुस्की लेवय लगा।

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