मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : संवैधानिक मर्यादा बनाए रखें

तड़का : संवैधानिक मर्यादा बनाए रखें

कविता श्रीवास्तव
देश के मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि न्यायपालिका में कार्यपालिका का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। इस बात को इस परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी है कि हमारे संविधान ने ही ऐसी व्यवस्था कर रखी है जिसमें न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका का काम एक-दूसरे से भिन्न हैं। हर कोई स्वतंत्र तो है, लेकिन मनमानी नहीं कर सकता। सभी के कामों पर एक-दूसरे की निगाहें रहती हैं। सभी को संविधान के दायरे में और कानून की व्यवस्था में ही रहकर काम करना होता है। विधायिका यदि कोई कानून बनाती है तो वह संविधान के दायरे में होना चाहिए। समयानुकूल परिस्थितियों में एवं राष्ट्रहित में कई बार संविधान में संशोधन की अनुमति दी जाती है। चीफ जस्टिस ने इसी बात का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया है कि बार-बार संविधान में संशोधन होगा तो यह संविधान फिर लिखने जैसा हो जाएगा। यह तो हमारे लोकतंत्र के विचारों के खिलाफ होगा। बाबासाहेब आंबेडकर ने जिस संविधान की रचना की है, वह सारी दुनिया के लिए एक आदर्श है और हमारे लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है। हमारे नियम-कानून में आवश्यकता के अनुसार जो बदलाव किए जाते हैं उनका हमेशा स्वागत होता है, क्योंकि वे जनहित की दृष्टि से किए जाते हैं। लेकिन संविधान के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ करने की अनुमति किसी को नहीं है।
वर्मा की विदाई का इंतजार
दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश रहे जस्टिस यशवंत वर्मा को उनके पद से हटाने के लिए संसद में मोशन लाए जाने की तैयारी की जा रही है। सरकार का विधि विभाग इस बात पर विचार कर रहा है कि यह मोशन पहले लोकसभा में लाया जाए या पहले राज्यसभा में। यदि इसे पहले लोकसभा में लाया जाएगा तो वहां कम से कम १०० सांसदों की संस्तुति आवश्यक होगी। यदि राज्यसभा में इसे प्रस्तुत किया जाएगा तो कम से कम ५० सांसदों की संस्तुति आवश्यक होगी। संसद में इस प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से पारित करना होगा। उसके बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। जस्टिस वर्मा को हटाए जाने का कारण है उनके घर से बड़ी मात्रा में बेनामी रकम प्राप्त होना। उनके खिलाफ तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने रिपोर्ट पेश कर दी है। इस पर कार्रवाई होनी है। यह पहला मौका नहीं है। इससे पहले कोलकाता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन को भी उनके पद से हटाया गया था। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के रामास्वामी को भी पद से हटाया गया था। जस्टिस पीडी दिनाकरन को भी लोकसभा में प्रस्ताव लाकर हटाया गया था। जब न्यायाधीश विवादों में आते हैं तो उम्मीद की जाती है कि वे अपने पद से स्वयं हट जाएंगे। लेकिन जब वे इससे मना कर देते हैं तो उन्हें वैधानिक तरीके से संसद में प्रस्ताव लाकर हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। न्यायाधीशों से यह उम्मीद की जाती है कि वे नैतिकता का खयाल रखें। पद की गरिमा और उसके निर्विवाद बनाए रखने की जरूरत का खयाल रखें।

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